आयुर्वेद का अर्थ औषधि - विज्ञान नही है वरन आयुर्विज्ञान अर्थात '' जीवन-का-विज्ञान'' है

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बुधवार, 29 अप्रैल 2009

सतावर ;एक प्राकृतिक अमृत

सतावर भारतीय जीवन पद्धति में शामिल एक ऐसा पौधा है जिसके गुणों को भारतीय मातायेअपने दूध के माध्यम से अपने शिशुओं में प्रविष्ट करा देती हैं । प्रसव के पश्चात दूध और खून बढ़ाने के लिए बनाए जाने वाले मेवे के लड्डुओं का सबसे प्रमुख घटक सतावर ही होती है । ये तो था सतावर का प्राथमिक परिचय । यह एक बहुवर्षीय आरोही लता है जो घरों या बगीचों में सुन्दरता हेतु भी लगाई जाती है । इसकी पूर्ण विकसित लता तीस फुट तक ऊंची हो सकती है । इसके पत्ते काफी पतले तथा सुईयों जैसे नुकीले होते हैं। इनमें छोटे -छोटे कांटे होते हैं। गर्मी में इस पौधे का उपरी भाग सूख जाता है तथा वर्षा ऋतू में नई शाखाएँ निकल आती हैं। सितम्बर- अक्टूबर में सतावर में फूलों के गुच्छे लगते हैं जो बाद में मटर के दाने जैसे हरे फलों में परिवर्तित होजाते हैं यही फल पक कर लाल रंग के हो जाते हैं जिनमे से बीज निकलते हैं।
सतावर की जड़ें औषधीय उपयोग में आती हैं । चर्म रोगों की यह प्रमुख दवा हैं। शारीरिक चोटों /दर्दों के निवारण में भी इनका उपयोग अति लाभकारी है । गठिया, पेट-दर्द ,पक्षाघात/अर्ध-पक्षाघात सर-दर्द,घुटने का दर्द ,पैर के तलवों में जलन ,गर्दन अकड़ना[स्टीफंस],साइटिका , हाथों में दर्द ,पेशाब संबन्धी रोग , आंतरिक चोट के अलावा शुक्र-वर्धन ,यौन -शक्ति बढ़ाने , महिलाओं के बाँझपन के इलाज में, महिलाओं के विभिन्न प्रकार के यौनिदोषों के इलाज में ही नहीं बल्कि माताओं का दूध बढ़ाने के साथ साथ गाय -भैसों का दूध बढ़ाने में भी सतावर का उपयोग होता है। यह एक चमत्कारी औषधि है।
सतावर केवल चमत्कारी औषधि ही नहीं है यह एक चमत्कारी फसल भी है। अगर कोई व्यक्ति एक एकड़ में पचास हजार रूपये लगाकर सतावर की खेती करे तो वह डेढ़ से दो साल में कम से कम दो लाख रूपये तो कमा ही लेगा । पूरे भारतवर्ष की जलवायु और जमीन इसके लिए उपयुक्त है।
सतावर का वैज्ञानिक नाम है --एस्पेरेगस रेसीमोसस । अन्यकिस्में हैं-- एस्पेरेगस सार्मेंतोसस ,एस्पेरेगस कुरिलास ,एस्पेरेगस गोनोक्लैदो एस्पेरेगस आफिसीनेलिस ,एस्पेरेगस फिनिसिलास , एस्पेरेगस स्प्रेंगेरी ,एस्पेरेगस एड्सेंदेस । संस्कृत भाषा में इसे शतावरी ,शतवीर्या ,बहुसुता ,अतिरासा एवं शतमूली भी कहा जाता है। फारसी में शकाकुल , अंगरेजी में एस्पेरेगुस , तमिल में किलावारी , बंगाली में शतमूली , मराठी और गुजराती में शतावरी , आसाम में हतामूली , सिन्धी में तिलोरा कन्नड़ में मज्जिगे गड्डे , तेलगू में चल्ला गड्डा आदि नामों से पुकारा जाता है।

8 टिप्‍पणियां:

Sheetal ने कहा…

aapka blog vakai gyanvardhak hai....aisay prayas ke liye sadhuvaad

Asha Joglekar ने कहा…

आपका ब्लॉग बहुत ही उपयोगी है । और काफी जानकारी पूर्ण भी ।

स्ट्रक्चर ने कहा…

Nice post
Thenks for comment on my blog

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

बहुत ही उपयोगी जानकारी दी है. धन्यवाद.

'' अन्योनास्ति " { ANYONAASTI } / :: कबीरा :: ने कहा…

आप के उपयोगी ब्लॉग की क्या प्रशंसा की जाए क्योंकि इसकी प्रशंसा करना सूरज को टार्च दिखना है यह "अप्रशंसनीय है" आप ने कबीरा पर अपनी टिप्पणी में फ़ोन न. की बात की थी लगता है किसी तकनीकी कारण से मेरा ई-मेल आप को नही मिला कोई फ़ोन इतने दिनो बाद भी ना मिलने के कारण पुन: न. दे रहा हूँ :--
09026382831 तथा 05278-222559 [सरल]
http://anyonasti-kabeeraa.blogspot.com/2008/11/blog-post.html

रंजू भाटिया ने कहा…

क्या इसको घर पर गमले में भी लगाया जा सकता है ? शुक्रिया इस पोधे की जानकारी देने के लिए

Dr Prabhat Tandon ने कहा…

इसमे कोई संशय नही कि Asparagus racemosa  का रोल प्रसूता के लिये बेहद लाभदायक है   , होम्योपैथिक दवाओं मे भी अब हाल मे  भारतीय मूल की दवाओं का चलन बढा है , देखे यहाँ । एक बार स्मरण दिलाने के लिये शुक्रिया

बेनामी ने कहा…

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