आयुर्वेद का अर्थ औषधि - विज्ञान नही है वरन आयुर्विज्ञान अर्थात '' जीवन-का-विज्ञान'' है

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Saturday, June 18, 2016

रेप केसेस और अपराध के पीछे का सच


मैं बहुत दिनों  अपने पाठकों से इस विषय पर बात करने के लिए सोच रही थी कि आज एक बहाना भी मिल गया। आज हिन्दुस्तान के  सम्पादकीय पेज पर राजेन्द्र धोड़पकर जी का लेख निकला है कि -"यह क्रूरता कहाँ से आती है " . इस विषय पर जब भी समाज के लोगों के बीच बहस होती है और जो निदान निकाला जाता है उनको सुनकर ऐसा ही  लगता है जैसे किसी पेड़ की हरियाली लौटाने के लिए उसकी ऊपरी पत्तियों और टहनियों पर पानी डाला जा रहा है ,जड़ों की तरफ कोई देख ही नहीं रहा। आइये देखते हैं कि इसकी जड़ें कहाँ हैं ---

वैसे आपको यह जान कर  आश्चर्य  होगा  कि इसके लिए हम ही  जिम्मेदार हैं।
पहला  कारण  -- जब भी कोई  नारी गर्भवती होती  है तो आयुर्वेद में उससे शारीरिक सम्बन्ध  बनाने की स्पष्ट मनाही की जाती है।
उसको अत्यधिक  आदर और सुख देने की बात कही जाती है। मगर ऐसा  होता नहीं। इसका बिलकुल विपरीत होता है।पुराणों में अनेक कथाओं में आपने पढ़ा होगा कि गर्भवती नारी को देवता खुद  प्रणाम करते हैं।और समाज में ??  गर्भवती नारी का मन शिशु से पूरी तरह जुड़ चुका होता है ,उसके द्वारा महसूस किया गया  सुख  दुःख और प्रत्येक स्वाद, एहसास और ज्ञान गर्भस्थ शिशु को मिलता है। अभिमन्यु की कथा तो आपको याद ही होगी। आप  जब अपनी गर्भवती पत्नी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं तो वस्तुतः यह नैतिकता  के विरुद्ध होता है क्योंकि आप पत्नी के साथ  नहीं वरन गर्भस्थ शिशु के साथ सम्बन्ध बना रहे  होते हैं. पत्नी का मन और तन दोनों ही  न ऐसे सम्बन्ध की चाह रखता है ,न ही अनुकूल होता है। इस सम्बन्ध का  बैड इफेक्ट शिशु के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है। संयम और नैतिकता  कंट्रोल करने वाला हारमोन यहीं डिसबैलेंस हो  जाता  है। शिशु को पहली शिक्षा  ही शारीरिक आकर्षण और सम्बन्ध की मिलती है। 

दूसरा कारण --- जब भी नारी गर्भवती होती है तो उसको छोटी -बड़ी अनेक दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। फिर हर दिक्कत के लिए हम इंजेक्शन ,टैबलेट आदि अंग्रेजी  दवाओं का सहारा लेते हैं। जिनके  साइड इफेक्ट जरूर होते हैं। जबकि ये सारी दिक्कतें रसोई में मौजूद चीजों से ही दूर हो सकती हैं जिनका कोई साइड  इफेक्ट नहीं होता। ये अंग्रेजी दवाएं गर्भस्थ शिशु  शारीरिक ,मानसिक विकास को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए  जिन महिलाओं ने गर्भवस्था में  पेट दर्द और सर दर्द के लिए दवाएं ज्यादा  ली होती हैं  उनके बच्चों के बाल कम उम्र में ही सफ़ेद होने लगते हैं और आई साइट कमजोर हो जाती  है। किसी किसी बालक को दोनों ही समस्याएं आती हैं। इम्युनिटी तो सभी बच्चों की  जरूर कम हो  जाती है ,नतीजा ये होता है कि पैदाइश के दो दिन बाद से ही डॉक्टर्स और हॉस्पिटल के चक्कर लगने शुरू हो जाते हैं। फिर इंजेक्शन, सीरप और टैबलेट का सिलसिला शुरू हो जाता है। नवजात शिशु को 6 माह तक माता के दूध के सिवा सारी चीजें देने की मनाही होती है और  उस नाजुक कोमल शरीर में भारी भारी केमिकल एंटी बायोटिक रूप में पहुँचने लगते हैं। जो शिशु में  हार्मोनल डिसबैलेंस पैदा करते हैं और बच्चे समय  से पहले ही जवान होने लगते हैं। हम लोग सारा दोष इंटरनेट ,मूवीज,और टी वी के सिर मढ़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। जबकि छोटे बच्चों के ज्यादातर  रोग तो मालिश ,सिकाई ,काढ़े  ही दूर हो जाते हैं। अनावश्यक रूप  से शरीर में पहुंची  ये दवाएं बच्चों की एकाग्रता छीन लेती हैं ,धैर्य धारण करने की क्षमता खत्म कर देती हैं। उत्तेजना और क्रोध बढ़ा भी देती हैं। सोचिये हम किस तरह के नागरिक  तैयार कर रहे  हैं। 

तीसरा कारण -- गर्भस्थ शिशु माता की संवेदनाओं को ग्रहण करता है ,इसीलिये गर्भवती को खुश रखने को कहा गया है ,उसके अच्छे  खाने पीने ,घूमने,अच्छे  साहित्य पढ़ने और सत्संग पर जोर दिया जाता है ,जिससे शिशु शांत,प्रसन्नचित्त और नैतिकता से भरपूर हो। हमारे समाज में होता है जस्ट उलटा।  सास, नन्द  झगड़े ,तकरार गर्भवती को या तो विद्रोह से भर देते हैं या अंजाना डर पैदा करते हैं। फलतः शिशु आक्रामक या दब्बू या कॉन्फिडेंस -लेस पैदा होता है।  रही सही कसर टीवी सीरियल के परिवार  तोड़ूं  दांव -पेंच पूरी  कर देते हैं।(याद कीजिये मूवी -"तीस मार खाँ ") जब नींव ही दुर्गुणों और दुष्प्रभावों से रक्त - रंजित हो तो उस पर शान्ति और सद्भावना की फसल उगेगी कैसे ?

ये दुष्प्रभाव उच्च कोटि की शिक्षा,पारिवारिक संस्कार और समाज के दबाव में दब सकते हैं ,और अनुकूल वातावरण शैतानियत को हावी होने से रोक सकता है। लेकिन ये बहुत मुश्किल है। आज कल की शिक्षा ज्ञान नहीं देती। मिड डे  मील और नंबरों की होड़ तक सीमित रह गयी है ,डिग्री खरीद ली जाती है ,ज्ञान मिलता नहीं। परिवार एकल रह गए हैं और बचा समाज ;इंटरनेट ,वीडिओ गेम ,मोबाइल में १२ से 15  घंटे बिताने वाले किशोर वहां तो उच्च कोटि की मार धाड़ , नशे आदि आनंद का ककहरा सीखते हैं। इंसानियत की शिक्षा के स्रोत ही दुर्लभ हो गए हैं। तो नैतिकता पनपेगी कैसे। लेकिन फिर भी कहा जा सकता  है कि बीज अच्छा होगा तो प्रतिकूल  वातावरण में भी मीठी फसल देगा। इसलिए बीजों की क्वालिटी निर्धारित करना ही हमारे हाथ में है। 

Thursday, April 28, 2016

आपके गंजे सर पर कैथ बाल उगा सकता है.


                                  


इसे पहचाना आपने ?यह कैथ का फल है। जो अक्सर स्कूलों के बाहर बिकता हुआ दिखाई देता है। लड़कियां बड़े चाव से खाती हैं। कुछ खट्टा मीठा सा होता है।  अक्सर इसे लोग हिकारत से देखते हैं। लेकिन ये है बड़े काम की चीज। आज के बाद कहीं बिकता दिखाई दे तो जरूर घर ले आइएगा। 
इसका पेड़ सारे देश में पाया जाता है। छोटे और चिकने पत्तों वाला ये पेड़ कम से कम 15 फुट ऊँचा तो होता ही    है। आप इसके फल के बीज कभी  फेकिएगा। हार्ट  पेशेंट के लिए तो अमृत हैं  इसके बीज। इसके २ बीजों का चूर्ण  बनाकर  कम से कम २१ दिन तक निगल लीजिए ,सादे पानी से। हार्ट प्रॉब्लम ख़त्म। उसके बाद साल भर तक हफ्ते में एक ही बार बीजों का चूर्ण लीजिएगा। 
कच्चे कैथ के गूदे के चूर्ण को खाने से आमातिसार अर्थात  दस्त और आंव  बहुत फायदा मिलता है। 5  ग्राम चूर्ण सादे पानी  से 5  दिनों तक निगलिए। 
कच्चे कैथ के रस में कसीस और करंज  को पीस कर ३ माह तक लगाने से सिर पर बाल  उग जाते हैं। 
इसका तेल दाद, खाज, खुजली पर लगाने से आराम मिलता है। 
बच्चों के पेट में दर्द  हो रहा हो तो बेलगिरी और कैथ  गूदे का शरबत मिला कर १-१ कप पिलाइए। एक बार पीने में ही आराम आ जाएगा।  
कच्चे कैथ  रस निकाल कर उसमे बराबर मात्रा में शहद मिलाइये और शहद की आधी मात्रा में छोटी पीपल का चूर्ण मिला लीजिये। यह दवा तैयार हो गई। किसी को उलटी आ रही हो तो आधा चम्मच यह दवा चटा दीजिये ,आराम मिल जाएगा। गर्भवती हों तो यह दवा जरूर बना कर रखिये। यह दवा बार बार आने वाली हिचकी में  भी काम करती है। 
दमा या अस्थमा की शिकायत हो तो कच्चे कैथ का रस १५ ग्राम रोज पीजिए। ४१ दिन में बीमारी जड़ से खत्म हो जायेगी। 
कैथ के पत्ते भी बहुत काम के हैं। दांत,मसूढ़े,या गले में कोई गांठ या दर्द हो तो पत्तों के काढ़े से गरारा और कुल्ला दोनों कीजिये। तुरंत आराम मिलेगा। सफ़ेद पानी गिरने की शिकायत में इसके पत्तों के साथ बांस के पत्ते पीस कर शहद से २ महीने तक चाटिये। 
कैथ अकेला  ऐसा खट्टा फल है जो वीर्यवर्धक है। वर्ना सभी खट्टे फल वीर्य का नाश करते हैं। 


कैथ को हिंदी में बिलिन या कटबेल भी कहते हैं। मराठी,गुजराती और फ़ारसी  में इसे कबीट कहते हैं। इसे तेलगू  में ऐलागाकाय और संस्कृत  में कपित्थ ,कुचफल ,गन्धफल ,चिरपाकी ,बैशाख नक्षत्री,दधिफल कहते हैं। वैज्ञानिक भाषा में इसे Feronia elephantum के नाम से जाना जाता है। 



इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Thursday, April 21, 2016

कितना भी पुराना कुष्ठ रोग हो काली जीरी और काले तिल को सम भाग में मिलाकर  ५ ग्राम सूर्योदय से पहले खाने से ख़त्म हो जायेगा। एक साल तक लगातार खाएं।  

Monday, March 28, 2016

आँखों की रोशनी



आँखों की रोशनी तेज करने के लिए इस दवा की  एक -एक बूँद आँखों में डालना काफी है ,लगातार एक महीने तक 


शुगर /मधुमेह/डायबिटीज की दवा



शुगर /मधुमेह/डायबिटीज की दवा बनने की प्रक्रिया में देखिये कितनी तरह की जड़ी बूटियां सूख रही हैं-








दवा बनने के कई फार्मूले मैंने पुराणी पोस्टों में लिख रखे हैं। अब किताबी सिद्धांतों को वास्तविक रूप में देखिये। 
यह दवा ब्लड सुगर को भी कंट्रोल कर देती है। सुगर जड़ से एक साल में ख़त्म हो जाती है। आपकी गयी हुई ताकत लौट आती है। 


Monday, March 7, 2016

बुखार और शिव जी का धतूरा



आज आप सभी ने शिव जी को धतुरा अर्पित किया होगा। प्रसाद में एक धतूरा उनसे वापस लेकर उसके बीज निकाल लीजिये और सुखा  कर किसी  कांच की शीशी में सुरक्षित रखिये। जब बुखार किसी दवा से न जा रहा हो तो सिर्फ २ बीज पानी  निगल लीजिये। बुखार आपको ही नहीं बल्कि आपका मोहल्ला छोड़ के फरार हो जाएगा।  


इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Friday, March 4, 2016

नपुंसकता के लिए ...


पुष्ट देह बलवान भुजाएं रूखा चेहरा ,लाल मगर 
लोगे या लोगे पिचके गाल ,संवारी मांग सुघर ?

यह प्रश्न आपसे किया जाए तो निश्चित ही आप पुष्ट देह और बलवान भुजाएं ही लेना चाहेंगे। लेकिन यह तभी संभव होगा जब आपके शरीर में वीर्य का निरंतर निर्माण होता रहे। आज के इस दौर में हमें ऐसा तरोताजा भोजन मिलता ही नहीं जिससे शरीर में पर्याप्त मात्रा  में वीर्य निर्माण हो सके।आज के इस प्रगतिशीलता  के दौर में तनाव और रेडिएशन भी वीर्य निर्माण की प्रक्रिया को बाधित करते हैं। दिन भर  बस,ऑटोरिक्शा ,ट्रेन आदि की यात्रा और समय  पर गंतव्य तक न पहुँचने का तनाव मनुष्य की आधी शक्ति निचोड़ लेता है। हर शहर में जाम लगता ही है। जाम में फंसे लोगो का अगर ब्लड प्रेशर और हार्ट बीट  नाप ली जाए तो डाक्टर सबको तुरंत I C U में भर्ती कर देंगे। यह अवस्था भी वीर्य का नाश करती है। 
इससे भी बड़ा एक और दुश्मन है जो हर कदम पर मौजूद है --मोबाइल और मोबाइल टावर , घरों में फ्रीज ,ओवन, ए सी आदि से निकलने वाला रेडिएशन , ये सब भी महिलाओं और पुरुषों की जीवनी शक्ति क्षीण करते हैं। रेडिएशन की वजह से गर्भस्थ शिशुओं में भी विकृति आ जाती है।  
                          यही नहीं जब किशोरावस्था में शरीर में वीर्य निर्माण शुरू होता है तो उसे संचित करने की बजाय युवा उसका दुरूपयोग शुरू कर देते हैं। हस्त-मैथुन तथा अन्य क्रियाओं द्वारा उसे नष्ट करने पर तुल जाते हैं। लड़कों में २१ वर्ष की उम्र लग जाती है वीर्य को पकने और पुष्ट होने में। लेकिन उसे कच्ची हालत में ही युवा दुरूपयोग करने लगते  हैं  वह पक नहीं पाता। इसका नतीजा निम्न बीमारियों के रूप में सामने आता  है --- 

***शरीर में भोजन नहीं  लगता, भले ही आप कोई अमृत खा लीजिये। 
***इम्युनिटी कमजोर हो  जाती है। 
***बुढ़ापा जल्दी घेर लेता  है। 
***कमर में दर्द बना रहता है। 
***कामेच्छा ख़त्म हो जाती  है। (पुरुषों और नारियों दोनों में )
***पेट के रोग हो जाते हैं और बाल सफ़ेद हो कर झड़ने लगते हैं। 
***चेहरे और बदन की रौनक ख़त्म हो जाती है। 
***मौसम चेंज  होते ही आप बीमार पड़ जाते हैं। 
***लिंग छोटा या टेढ़ा हो जाता है। 
***युवावस्था में यौवन का भरपूर आनंद आप नहीं उठा पाते। 
****लड़कियों में अनियमित मासिक स्राव तथा फेलोपियन ट्यूब में इन्फेक्शन की प्राब्लम  जाती है। 
***संतानोत्पत्ति में परेशानी आती है क्योंकि शुक्राणुओं की संख्या और गति दोनों ही कम होती है। 
****अगर किसी तरह संतान हो भी गयी तो वह किसी  न किसी बीमारी से दुखी रहती है। 

सोचिये किशोरावस्था का थोड़ा सा सुख आपको कितना महँगा पड़ता है। क्योंकि बस यही आपके हाथ में होता है। तनाव और इलेक्ट्रिक और मैग्नेटिक रेडिएशन पर आप कंट्रोल नहीं कर सकते क्योंकि वह ज़िंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। 
आयुर्वेद में ही इसका सटीक उपचार है।
स्त्री और पुरुषों के लिए निर्गुण्डी रसायन तो हमने बनाने की विधि पिछली पोस्टों में लिखी ही है। इसके अतिरिक्त कुछ और दिव्य औषधियां हैं जिसकी पूर्ण जानकारी आप हमसे ले सकते हैं। यह दवाएं ऎसी नहीं होती कि सभी जगह आसानी से मिल जाएँ। किन्तु फिर भी मुझ जैसे कुछ अन्वेषी खोज ही लेते हैं। 
पुरुषों के लिए एक ख़ास घी, तेल तथा  महिलाओं के लिए एक अवलेह निरंतर वीर्य निर्माण की क्रिया को गति प्रदान कर देता है। 

पत्थर सी हों मांसपेशियां, लोहे से भुजदंड अभय 
नस -नस में हो लहर आग की तभी जवानी पाती जय। 

आइये अपने शरीर में पुनः वीर्य  निर्माण करें।


आप किसी  जिज्ञासा के लिए मुझे फोन कर सकते हैं- ९८८९४७८०८४, 8604992545         




Tuesday, January 12, 2016

हड़जोड़ सिर्फ हड्डी ही नहीं जोड़ता

हर जोर का बैग्यानिक नाम है रिलीस कटरा पाटन गुजरातचेहरा चेंजइसकी बेटी हर जाति की होती है इसका उपयोग टूटी हुई हड्डी को जोड़ने में किए जाने के कारण इसका नाम हर जोर है  इसको हिंदी में अच्छी संघार के नाम से जाना जाता है संस्कृत में कोशिश टू घंटी किया बंदर बिल्ली इसको कहा जाता है और गुजराती में बेदारी मराठी में कंध वेद बंगाली में हार बंद मराठी में जहाज जो भी कहा जाता है तेलुगु में भववा डबल जी के नाम से उसको जानते हैं यह पौधा पूरे भारतवर्ष में पाया जाता है इस दिल में 46 अंगूर पर घाटे होती है जैसे तू घर का पौधा होता है ठीक उसी तरह यह होता है लेकिन तू हर की चौड़ाई कुछ ज्यादा होती है वह मोटा होता है यह बिल्कुल उंगली के बराबर पतला होता है इसका डंठल करवादी होता है लेकिन इसका सबसे प्रमुख यूज़ जो है यह आंखों के सारे लोगों को खत्म करता है टूटी हड्डी को जोड़ने के लिए इसका उपयोग किस तरह से आप कर सकते हैं सबसे पहले हाथ जोड़ की नर्म लकड़ी का टिकट ले करके उसे बारीक पीसना उसने बराबर मात्रा में उड़द की दाल वन मिला दे उड़द की दाल ही बारीक पीसना और दोनों को मिलाकर किसी भी टूटी हड्डी के ऊपर सिंघाड़ा लेट कपड़ा लपेटकर के कपड़े से बांध देंगे तो हड्डी जोड़ जाती है यह लेप हर तीसरे दिन बदलते तीसरे दिन फिर से ले कर के फिर उसको पांडे की तरह से करने से एक महीने के अंदर ही हड्डी जोड़ जाती है और हड्डी टूटने का जो दर्द होता है वह तो एक हफ्ते में ही समाप्त हो जाता है लेकिन सिर्फ हड्डी जोड़ने के लिए ही इसका उपयोग नहीं होता यह पेट की गैस के दर्द को भी यह खत्म करता है अक्सर अक्सर एक उम्र के बाद पेट में दर्द होने लगता है साक्षअक्सर लोग प्लीपीठ के दर्द के कारण ठीक से सो नहीं पाते ।इस तरह की हालत में हाड़जोड़ की लकडी पीस कर के  उसको पोस्टपीठ पर लेप कर दीजिए या पीठ पर उसकी मालिश कर दीजिए पीठ का दर्द खत्म हो जाता है यह इसका सबसे उपयोगी गुण है ।
इसे और भी बहुत सारी बीमारियों से सही होती है कुछ बीमारियों के बारे में बता रही हूं -------
अगर अनियमित मासिक धर्म है तो इसके तने का रस दीजिए इसके तने का रस आप दो चम्मच लीजिए पांच सात दिन तक पीने से काफी लाभ आपको मिलेगा ।

इसके अलावा अगर गठिया है तो हर जोड़ की लकड़ी का टुकड़ा और उड़द की दाल पीस कर के पकौड़ी तिल के तेल में पकौड़ी बनाइए और उसको खा लीजिएगा और तुलगातार एक महीने खाने से गठिया जड़ से खत्म हो जाता है ।
अगर किसी के दर्द हो रहा है तो हड़ जोड़ के पत्ते और इसकी कोपल का पाउडर हर जोड़ के पतिऔर उसके तने के ऊपर वाली भाई ऊपर वाले का पाउडर पीस कर केसे पानी के साथ साथ दीजिए को वस्त्र बंद हो जाती है ।
अगर कान में दर्द हो रहा है बिस्कुट का रस निकालकर के दो बूंद कान में डाल दीजिए तुरंत आराम मिलता है ।

अगर मसूड़ों में सूजन आ गई है तू इसमें भी हर जोर बहुत काम करता है ए 10 ग्राम के रस को एक चम्मच शक्कर में मिलाकर पर चढ़ा दीजिए मसूड़ों की सूजन खत्म हो जाएगी ।यह  काम आप को कम से कम एक 11 दिन करना चाहिए चरणों की सूजन अब अपने आप खत्म हो जाएगी।
अगर पेट में दर्द हो रहा है तो हड़जोड़ की 4 या 5 शाखा को चुने के पानी में उबाल लीजिये ।फिर उस पानी को छान कर पिला दीजिये।
यह औषधि ताकत भी प्रदान करती है ।5 ग्राम की मात्र में इसके चूर्ण को पानी के साथ लेने से अनोखे बल की प्राप्ति होती है।
बी भूख बढ़ानी हो तो हड़जोड़ सेंक कर उसकी चटनी बनाकर खाएं।
किसी को दमे वाली खांसी हो तो प्रतिदिन इसके ताने का 2 चम्मच रास पिलायें ।2 माह में टी बी या दमा जड़ से ख़त्म हो जायेगा।
खाना देर से हजम हो रहा हो तो हड़जोड़ का 2 ग्राम चूर्ण और सोंठ का 2 ग्राम चूर्ण मिलाकर पानी से निगलिये लगभग 12 दिनों तक ।
पूरे बदन में दर्द हो रहा हो तो बिस्तर पर हड़जोड़ की मुलायम टहनियों को बिछा कर उन पर सोने की सलाह आयुर्वेद देता है।
इसका वैज्ञानिक नाम है Vitis Quadrangularis.





इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Monday, January 11, 2016

आपके अच्छे स्वास्थ्य के लिए



आजकल किडनी में इन्फेक्शन और  रीनल फेल्योर की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसा कुछ भी आपके जीवन में न हो , इसके लिए आवश्यक है कि हम ऐसा काम करें जिससे हमारी किडनी पर  किसी भी इंफेक्शन  का असर ना हो उसका कार्य जिंदगी भर सुचारु रुप से चलता रहे.

 सबसे पहले यह आवश्यक है कि जब भी आप भोजन करें तो उसके बाद यूरिन डिस्चार्ज जरूर करें भोजन के बाद यूरिन डिस्चार्ज से  किडनी सही तरीके से काम करती रहती है और एक दूसरा उपाय और है उसको भी आप अवश्य करें हर सप्ताह में एक दिन कोई भी एक दिन निर्धारित करने उस दिन ककड़ी के बीजों का चूर्ण तीन ग्राम की मात्रा में तीन ग्राम चीनी मिलाकर के पानी के साथ निगल लीजिए।   सप्ताह में एक बार ऐसा करने से आप अपनी किडनी को सारी जिंदगी सुरक्षित रख सकेंगे।  किडनी पर इंफेक्शन का असर नहीं होगा और वह सही तरीके से काम करती रहेगी।  जिससे ना किडनी ट्रांसप्लांट की समस्या होगी न ही पथरी या प्रोस्टेट की। स्वास्थ्य की अक्सर समस्याएं सिर्फ इस वजह से पैदा होती है कि हम सुचारु रुप से मूत्र विसर्जन नहीं करते हैं क्योंकि यूरिन  डिस्चार्ज वह प्रमुख जरिया है जिसके माध्यम से हमारे शरीर का ज्यादातर विष  बाहर निकल जाता है।  यह विष , जो हम विभिन्न वस्तुओं के माध्यम से अपने शरीर में पहुंचाते  हैं।  इस विष  को  शरीर में संग्रहित करने से अच्छा है उसे यूरिन डिस्चार्ज के माध्यम से बाहर निकाला जाये।
























Thursday, October 15, 2015

कामयाबी



एक छोटी सी कामयाबी मिली है। लोग कहते हैं कि एक बार डायलिसिस शुरू हो जाय तो ये सारी ज़िंदगी होती रहती है। पता नहीं क्यों। 
मगर अगर ये सच है तो आज दो लोगों को और उनके बीसों परिवारजनों को इस आफत से छुटकारा मिल गया। एक ७० वर्षीय बुजुर्ग हैं और दूसरे सज्जन तो अभी ४५ वर्ष के हैं। बुजुर्गवार की  डायलिसिस बंद हुए तो 8 माह हो गए। वे  प्रसन्न हैं। उनके नाती -पोते  भी  खुश। दूसरे सज्जन की तो अभी कच्ची गृहस्थी है और पूरा परिवार बहुत खुश है। 
और मेरी ख़ुशी आप निम्न पंक्तियों से समझिए ------
दीनों का संतोष, भाग्यहीनों की गदगद वाणी,
नयन-कोर में भरा लबालब कृतग्यता का पानी,
हो जाना फिर हरा,युगों से मुरझाये अधरों का ,
पाना आशीर्वचन,प्रेम,विश्वास अनेक नरों  का। 
       इससे बढ़ कर और प्राप्ति क्या जिस पर गर्व करें हम ?
        पर को जीवन मिले अगर तो हंस कर क्यों न मरें हम ? 
                                                          ……… रश्मिरथी 

भगवान से एक  ही प्रार्थना है कि मुझे आयुर्वेद का और गहरा ज्ञान दीजिये जिससे  मैं खुशियों के ढेर सारे फूल बिखेर सकूँ। 

Thursday, September 17, 2015

सभी तरह के कीड़ो की दुश्मन काली जीरी


     सबसे पहले आप काली जीरी और काला जीरा के चित्र को ध्यानपूर्वक देखिये -----




                                                                   यह काला जीरा है
Jeera di Kala (cumino nero) Immagini Stock




                                                                       यह काली जीरी है

चरक कहते  हैं कि  ----
विषघ्नी च सोमराजी विपाचिता।
 काली जीरी को देश के विभिन्न भागों में भिन्न -भिन्न नामों से पुकारा जाता है। ये नाम हैं-
सोमराजी, वनजीरक, अरण्यजीरक, मलौबक्शी, काकशम, बृहत्पाली, तिक्तजीरक, रणचजिरी, कलुजौरी, हकुच , बकौकी  आदि। इसको वैज्ञानिक भाषा में Vernonia anthelmintika कहते हैं।
काली जीरी के पौधे की एक खासियत है की ये पड़ती जमीनो पर उगा हुआ मिलता है।
## चरक संहिता में स्पष्ट है कि शरीर में कैसा भी जहर हो काली जीरी उसको नष्ट करने की क्षमता रखती है। यह शरीर में मौजूद हर प्रकार के कीड़ों को मारने में सक्षम है। ५ ग्राम काली जीरी लेकर उसको २०० ग्राम पानी में धीमी हीट पर उबालिये। जब १०० ग्राम पानी बच जाए तो उसको थोड़ा ठंडा करके पी जाएँ। याद  रखिये बहुत कड़वा होता है।५-६ दिन तक पीना पर्याप्त होगा। 
## किसी को फालिज मार गया हो तो आप इसको पीस कर पानी के साथ पतली चटनी बनाइये और प्रतिदिन प्रभावित अंगो पर लेप कीजिये।एक महीने में आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिलेगा। 
## चर्म रोग, सफ़ेद दाग,सोरायसिस ,असमय बाल सफ़ेद होना या बाल गिरना,इन सभी रोगों में काली जीरी और काले तिल को सूर्योदय से पहले लिया जाए तो  एक साल में ही रोग जड़ से समाप्त हो जाता है। कैसा भी भयंकर चर्म रोग हो उसके कीटाणुओं का वंश ही समाप्त हो जाता है। 
## इसके सेवन से श्वास नली की तकलीफ तथा हिचकी ख़त्म हो जाती है। 
## यह शरीर से सारे बलगम को निकाल बाहर करती है। सर्दी की तकलीफ में बहुत आराम देती है।
##  इसके काढ़े से बवासीर में भी आराम मिलता है। ५० ग्राम काली जीरी कच्ची ही पीसिये और ५० ग्राम भून कर पीसिये।  दोनों चूर्ण मिलाइये। ४ ग्राम की मात्र में रोज खाइये। २१ दिनों में खूनी बादी हर तरह की बवासीर जड़ से ख़त्म हो जायेगी।  







इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Tuesday, September 1, 2015

मुंह का कैंसर कभी नहीं होगा




 हम बहुत अत्याचारी हैं। अपने मुँह  साथ हम कितने कुकर्म करते हैं। कितना गर्म खा लेते हैं की मुंह जल जाता है। कितना ठंडा खा लेते हैं की मसूड़े काँप जाते हैं। कितना खट्टा, तीता, नमकीन, मीठा। नतीजतन बेचारे दांतों और जीभ की दुर्गति हो जाती है। फिर आज कल के पानमसालों  का तो कहना ही क्या।कैंसर को खुला आमंत्रण !!!!! यही नहीं इसी मुंह से कुछ भी बोल देते हैं। भली बातों का प्रतिशत शायद कम ही होता होगा। बुरी बातें ज्यादा ही बोलते हैं। जबकि शब्द को ब्रह्म कहा गया है। जिसका सीधा सम्बन्ध मुंह और आत्मा से होता है। अगर अब भी आपको अपनी गलती का एहसास हो गया हो तो आइये इस मुंह के लिए कुछ अच्छा काम किया जाए --------
कम से कम ५ चम्मच सरसों का तेल मुंह में लीजिये और उसे दांतों से खूब चबाइए। यूं जैसे कि कोई बहुत कठोर चीज चबा रहे हों। ५ मिनट तक चबाने के बाद थूक दीजिये और साफ़ पानी से कुल्ला कर लीजिये।  इस तेल को निगलना नहीं है। चबाने की प्रक्रिया के दौरान ये आपके शरीर के जहरीले तत्वों को खींच लेता है। और शरीर को निम्नलिखित फायदे पहुंचाता है ----
                            पान मसाला खा कर आपने जितने मसूड़े खराब किये हैं वो सही हो जाएंगे। 
                   पायरिया ख़त्म हो जाएंगे। 
       दांत मजबूत होंगे और बुढ़ापे में गिरने की संभावना ८०% ख़त्म। 
    लीवर सही रहेगा। 
जीभ में छाले नहीं पड़ेंगे। 
    टांसिल की शिकायत ख़त्म। 
    चेहरे पर झुर्रियां नहीं पड़ेंगी। 
   छः रसों का स्वाद जीभ को महसूस होता रहेगा। अर्थात भोजन का असली आनंद महसूस होगा। 
         कम सुनने की शिकायत दूर होगी। 
आँखों की रोशनी बेहतर रहेगी। 

इतने सारे फायदे सिर्फ एक काम से -कि प्रतिदिन सवेरे सरसों का तेल  मुंह में भरकर ५ मिनट तक खूब चबाएं। 




Tuesday, August 25, 2015

आश्चर्यजनक रूप से दिमाग तेज करती है मालकांगनी




ज्योतिष्मति अर्थात मालकांगनी एक पराश्रयी लता है जो पूर्वी हिमालय में 6000  फीट की ऊंचाई तक मिलती है। गुजरात ,महाराष्ट्र और मध्य भारत में भी यह पाई जाती है। यह आयुर्वेद की मुख्य औषधियों में से एक है। इसका तेल बेरी-बेरी जैसे महाभयंकर रोग की भी बहुत कारगर दवा सिद्ध हुआ है। 

ज्योतिष्मति का वैज्ञानिक नाम है- Celastrus paniculatus , इसे बंगाल में लताफ्टकी, मध्यप्रदेश में ककुन्दन रंगुल , पंजाब में संखू , केरल में बर्बज और इस्कट ,तमिल में कलिगम शेष भारत की भाषाओं में मालकांगनी कहते हैं।   
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ज्योतिष्मति के बीज में तेज गंध-युक्त तेल होता है। साथ ही  कुछ पेनीकुलेटिन ,सिलासट्रीन, टैनिन और कड़वा राल भी मिलता है।

आइये इसके औषधीय गुणों पर निगाह डालते हैं -------

****** अफीम के विष  को उतारने के लिए इसके 10 पत्तों का रस पिला दीजिये। 

 ***** बेरी-बेरी रोग के रोगी को इसके तेल की 10 से 15 बूंदे बताशे में डाल कर खिलाइये ,कम से कम 2 माह तक। 
***** चित्रा सर्प जब किसी पशु या मनुष्य को काट लेता है तो काटे हुए स्थान पर मांस सड़ जाता है फिर धीरे धीरे आस-पास का मांस भी सड़ कर गिरने लगता है। ऎसी दशा में मालकांगनी की जड़ ,अजवाइन और सिरस की छाल बराबर मात्रा में लेकर पानी के साथ पीस कर घाव में भरना चाहिए औरऔर १० से बीस ग्राम की मात्र में पिला भी देनी चाहिए। पशुओं के लिए मात्रा 100 ग्राम है। 
***** अगर फालिज मार गया हो तो मालकांगनी के बीज खाइये पहले दिन १ दूसरे दिन २ तीसरे दिन ३. इसी तरह १५ दिनों तक बढ़ाते हुए खाइये और इसके तेल की मालिश भी कीजिये। यह क्रम अपनाने से गठिया और जोड़ों के दर्द में भी फायदा होता है। 
****** जो महिलायें गर्भपात से परेशान है और गर्भकाल पूर्ण करके स्वस्थ संतान नहीं पैदा कर  पा रहीं हैं उनको गर्भ धारण के पहले  बाद ही या जब ज्ञात हो जाए कि वह गर्भवती हैं तब मालकांगनी की चार अंगुल लम्बी जड़ को कमर में बाँध लें और गर्भ काल पूर्ण होने से २-३ दिन पहले खोल दें। लेकिन यह जड़ रविवार के दिन ही खोदनी चाहिए।मालकांगनी  की लताओं पर सफ़ेद धब्बे होते हैं। 
***** खुजली ,सफ़ेद दाग ,नासूर, पुराने घाव सिर्फ इसका तेल लगाने से नष्ट हो जाते हैं। 
***** जलोदर में इसके तेल की १० बूंदे रोज सेवन कीजिए। 
***** इसके बीजो को पानी में पीस कर लेप करने से खूनी बवासीर में भी फायदा हो जाता है। 
***** इसका तेल २ ग्राम तक रोज दूध में मिला कर पीने से स्मरण शक्ति बहुत तेजी से बढ़ती है।     
***** आँखों की रोशनी बढ़ानी है तो इसके तेल की पगतलियों पर रोज मालिश कीजिए। 
***** नपुंसकता मिटाने के लिए इसके तेल की १०-१० बूंदे नागरबेल के पान में डाल  कर खाइए। साथ ही दूध-घी का ज्यादा सेवन कीजिए। 
आयुर्वेद में शिरोविरेचन के साथ साथ कई अन्य अंगों के विरेचन हेतु भी मालकांगनी को प्रमुख स्थान दिया जाता है। 
इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Sunday, May 31, 2015

शरीर को लू और धूप से बचाता है ; अनानास






पूरा पेड़ कांटेदार होता है। लेकिन है बड़े काम का।लेकिन  सावधान इसका  मध्य भाग नुकसानदेह होता है इसलिए उसको निकाल कर ही  इसे खाएं। इस कांटेदार पेड़ और फल में बड़े गुण होते हैं।आइये कुछ गुणों पर निगाह डाल लेते हैं- 
@@@@अगर पेट में कीड़े हो गए हों तो अनानास का फल लगातार ७ दिनों तक खाइये। या इसके पत्तों का जूस पीजिये। 
@@@@पेट दर्द कर रहा  हो तो तीन चम्मच  फल  का रस, 6 चम्मच अदरक का रस ,२ चुटकी सेंधा नमक और एक चुटकी हींग मिलाकर पी  लीजिये। 
@@@@अगर भोजन के साथ आपके पेट में बाल चला गया हो तो भी पेट दर्द होता है  यह पेट दर्द बहुत अजीब सा होता  है। ऎसी  हालत में तो एकलौती दवा है पका हुआ अनानास। बस भरपेट खाइये,बस बीच वाला  हिस्सा निकाल   दीजियेगा क्योंकि उसको खाने से शरीर में कुछ दूसरे उपद्रव हो सकते हैं। 
@@@@लू या धूप लग गयी हो तो ४ दिन लगातार अनानास खाइये। 
@@@@लेकिन खाली पेट अनानास नहीं खाना चाहिए। 
@@@@गर्भवती महिला को भी अनानास नहीं खाना चाहिए। 
@@@@बहुत तेज  भूख लगी हो तब भी अनानास नहीं खाना चाहिए। 
@@@@अगर किसी को बार बार पेशाब जाने की बीमारी हो तो उसको  ११ दिन तक अनानास का फल जरूर खाना चाहिए। 
@@@@पूरे शरीर में  जलन  महसूस हो रही हो तो अनानास का फल खाइये। 
@@@@अनानास पित्त  विकार नष्ट करता  है जिसकी वजह से  फोड़े फुंसी ,घमौरियों से राहत मिल जाती है। 
@@@@अनानास लीवर और आमाशय को  ताकत प्रदान करता है।
@@@@अनानास हृदय को भी मजबूती देता है। 
@@@@यह  दिमाग को भी ताकत देता है। 
@@@@अगर हिचकी आ रही हो तो अनानास के पत्तों के रस में मिश्री मिलाकर पिलाइये। 
@@@@बुखार के बाद लीवर कमजोर हो जाता है इसलिए बुखार उत्तर जाने के बाद  रोगी को अनानास का रस  जरूर पिलाना चाहिए ताकि पेट की गरमी ख़त्म हो और लीवर सही तरीके से काम करना शुरू करे। 
@@@@हार्मोनल डिसबैलेंस की वजह से या पिल्स ज्यादा खाने की वजह से जिन  महिलाओं के गर्भाशय में भिन्न भिन्न तरह के विकार आ जाते हैं उनका भी इलाज अनानास के फल और पत्तो के रस से हो सकता है। किन्तु इसके लिए आपको एक्सपर्ट की राय जरूर लेनी चाहिए।   

  





इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Sunday, May 3, 2015

रसायन के लाभ


मैंने अभी तक तीन तरह के रसायन बनाने में सफलता पाई है। ये हैं-
निर्गुण्डी रसायन 
हल्दी रसायन 
पिप्पली रसायन 
अभी तक सैकड़ों मरीज इनका प्रयोग करके स्वास्थ्य और आयु -बल आदि प्राप्त कर चुके हैं। फिर भी जब आज भी मुझसे यह सवाल पूछा जाता है कि  इन रसायनों से क्या क्या फायदे होते हैं तो मैं सारे लाभ तो नहीं ही गिना पाती हूँ। मैंने आज सोचा कि मैं अपने प्रबुद्ध पाठकों को ये बता दूँ कि चरक संहिता के अनुसार रसायन के क्या लाभ हैं ---
रसायन वे औषधियां हैं जो स्वस्थ पुरुष के लिए  ओजस्कर हैं ,बल को बढ़ाती हैं और जीवनीय शक्ति प्रदान करती हैं। मनुष्य रसायन के  सेवन से स्मृति ,मेधा (धारण करने वाली बुद्धि ),आरोग्य, जवानी  भरी उम्र, प्रभा वर्ण और स्वर की उदारता,  देह और इन्द्रियों में परम बल ,वाक् सिद्धि (मनुष्य जो कहे वही हो ,अथवा अच्छी वाणी ),प्रणति अर्थात लोक समाज में आदर योग्य स्थान तथा कान्ति अनायास ही प्राप्त कर लेता है। 
अर्थात जिसके द्वारा शुभ गुण  युक्त रस आदि धातुओं की प्राप्ति हो वही रसायन है। इन्हीं प्रशस्त रस आदि धातुओं के कारण बुढ़ापा शीघ्र नहीं आता और शरीर अन्य रोगो से भी बचा रहता  है।  मेधा ,मन आदि  भी अन्न पर आश्रित हुआ करते हैं इसलिए मन और बुद्धि सदा सात्विक रहती है। इसीलिए प्रकृति भी उस मनुष्य के  अनुकूल व्यवहार करती है। 
इतने सारे लाभ रसायन सेवन से होते हैं। 
रसायनो का सेवन पूर्ण ब्रह्मचारी तो  यथाविधि कर ही लेते हैं किन्तु गृहस्थियों के लिए भी रसायन प्रयोग आवश्यक कहा गया है। क्योंकि गृहस्थ धर्म के समुचित रूप से पालन में अधिक कमजोरी नहीं आती लेकिन जो लोग विषयों की तृप्ति (वासना )में ही लगे रहते हैं,उनमें अधिक कमजोरी देखी गयी है।ब्रम्हचर्य के पालन न करने से राजयक्ष्मा आदि (टी बी ) रोग हो जाते हैं। वात का प्रकोप(मोटापा ) तो विशेषतः होता है। वीर्य  धातुओं का सार है। इसके नष्ट होने से शरीर की सब धातुएं क्षीण हो जाती हैं ,बुद्धि मंद हो जाती है। शरीर में स्फूर्ति और तेज नहीं रहता। अतः इस कमी को पूरा करने के लिए गृहस्थियों को वाजीकरण आहार -विहार या रसायन का सेवन करना अति आवश्यक है। यदि इस कमजोरी या धातुओं की क्षीणता को रसायन औषध द्वारा पूरा न किया जाये तो वह  शरीर शीघ्र ही धराशायी हो जायेगा। 
अतः आत्मवान मनुष्यों को नित्य ही रसायन आदि द्रव्यों की खोज करनी चाहिए। क्योंकि इन पर ही धर्म ,अर्थ, प्रीति  और यश आश्रित हैं।  

Thursday, April 30, 2015

शिलाजीत ; क्या सच्चाई है और क्या रहस्य



शिलाजीत पर अभी तक जितना मेरा अध्ययन है उससे मैं आप सभी को अवगत करा देना चाहती हूँ। मेरे संसाधन सीमित होने के कारण प्रचुर मात्रा में मुझे शिलाजीत उपलब्ध नहीं हो सकी जिसकी वजह से मैं पर्याप्त प्रयोग नहीं कर सकी। फिर भी यह तो मानना ही होगा कि शिलाजीत का उचित प्रयोग वाकई चमत्कार दिखाता है। 
अनम्लम च कषायं च कटु पाके शिलाजतु। 
नात्युष्णशीतं धातुभ्यश्चतुर्भ्यस्तस्य सम्भवः।।.  
इस परिभाषा के अनुसार किसी भी शिलाजीत में अम्ल नहीं होता, कसैलापन होता है जो विपाक में कटु हो जाता है। यह न ही गरम होती है न ही ठंडी। यह जिन धातुओं से उत्पन्न होती है उनका ही गुण ग्रहण कर लेती है। शिलाजीत मुख्यतः चार धातुओं से उत्पन्न मानी गयी है --सोना ,चांदी ,तांबा और लोहा। महर्षि सुश्रुत  ने शिलाजीत की उत्पत्ति दो और धातुओं से मानी है-वंग  और सीसा। कुल मिला  कर ६ तरह की शिलाजीत अभी तक ज्ञात हैं।  वास्तविक शिलाजीत में अनेक तरह की गन्दगी होती है। रेत -पत्थर- पत्ते आदि अनेक चीजे इसमें मिक्स होती हैं। शिलाजीत की अशुद्धियों को दूर करने के लिए सबसे पहले उसे सादे जल से धो लेना चाहिए। फिर शिलाजीत की मात्रा से दूना गरम जल लेना चाहिए। शिलाजीत गर्म जल में घुल जाती है और अशुद्धियाँ नीचे बैठ जाती है। ऊपर से जल निथार कर उसे धुप में सुखाने पर शुद्ध शिलाजीत प्राप्त होती है। अशुद्धियों को पुनः गरम जल में घोल देना चाहिए ताकि सारी शिलाजीत पानी में आ जाए और अशुद्धियाँ बिलकुल अलग हो जाएँ। अब इसी शिलाजीत को वातघ्न अर्थात वात को नष्ट करने वाली औषधियां ,पित्तघ्न अर्थात कुपित पित्त को नष्ट करने वाली औषधियां तथा कफघ्न अर्थात कफ को संतुलित करने वाली औषधियों  के रस में भावना देकर उसकी रोगनाशक शक्ति  को कई गुना बढाया जा सकता है। इस तरह से तैयार की हुई शिलाजीत खुद ही में रसायन बन जाती है। अत्यधिक बल प्रदान करने का गुण उसमें आ जाता है और रोगनाशक तो हो ही जाती है। 
शिलाजीत का सेवन दूध के साथ करने से यह बुढापे को दूर करती है ,आयु-जनित रोगों को दूर करती है, शरीर को दृढ़ता प्रदान करती है ,शक्ति प्रदान करती है ,बुद्धि को तीव्र और स्मृति को भी दृढ करती है। 
शिलाजीत को चरक संहिता के अनुसार निरंतर सात सप्ताह तक प्रयोग करने से यह उचित फल प्रदान करती है ,हमने अपने प्रयोगों में देखा कि इसे कम से कम सौ दिनों तक लगातार  लेना ही श्रेयस्कर साबित हुआ। लेकिन इसे पांच रत्ती से कम तो कत्तई नहीं लेना चाहिए। 
हर पर्वत की  अपनी धातुएं होती हैं। अर्थात उस पर्वत का निर्माण जिन शिलाओं से हुआ  है वह शिलाएं ही धातु को खुद में समेटे रहती हैं। सोना चांदी ताम्बा लोहा शीशा रांगा यही वे धातुएं हैं जो प्रकृति में बिखरी हुई हैं। यही धातुएं जब पत्थर बन जाती हैं तो उन पत्थरों का समूह पर्वत का आकार  ले लेता  है। ज्वालामुखी का पिघलना  इन्ही धातुओं की वजह से होता है।इन धातुओं की शिलाएं जब सूरज की  गरमी से  तप जाती हैं तो वे पिघलती हैं और लाख जैसा द्रव उनमें से निकलता है। यही द्रव शिलाजीत कहलाता है।अभी तक इन्ही छः धातुओं की शिलाओं को पिघलते हुए देखा गया है। इसलिए छः प्रकार की  शिलाजीत का वर्णन आयुर्वेद में मिलता है।      
शिलाजीत को अपने रोग के अनुसार निम्न में से किसी एक में घोल कर पीना चाहिए -
दूध, सिरका, मांस-रस, जौ-रस, चावल का धोवन, गोमूत्र, या किसी औषधि का काढा। 
शिलाजीत के सेवन के दौरान कब्ज पैदा करने वाली वस्तुओं ,नशा पैदा करने वाली वस्तुओं और भारी अनाज के सेवन का निषेध है। 
शिलाजीत  में गोमूत्र जैसी  गंध आती है। 
शिलाजीत के  सेवन के दौरान पथरी की दवा के रूप मे प्रयुक्त किसी औषधि ,साग और शरबत का प्रयोग नहीं करना चाहिए। 

विधिपूर्वक प्रयोग होने पर शिलाजीत भयकर रोगों को बलात नष्ट कर देती है ,यह स्वस्थ मनुष्यों को भी विपुल शक्ति प्रदान करती है। 






इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Thursday, March 26, 2015

trifala





आप  त्रिफला चूर्ण बहुत प्रयोग कर चुके होंगे ,अब जरा  इस  विधि से प्रयोग कीजिये लेकिन मुझे रिजल्ट जरूर बताइयेगा --- एक चम्मच त्रिफला लीजिये, थोड़ा सा पानी मिला कर पेस्ट बना लीजिये ,अब उसे  किसी नयी लोहे की कढ़ाही में अंदर लेप  करके छोड़ दीजिये, २४ घंटे बाद खुरच कर निकाल लें और एक चम्मच शहद मिला कर पानी में एक गिलास शरबत बनाएं और पी जाएँ। जब खुरच कर निकालें तो आधे घंटे बाद उसमें दुबारा लेप करके  रख दें। यह प्रक्रिया एक माह तक लगातार करें फिर देखिये चमत्कार। 

Sunday, March 1, 2015

मेरे मित्र ने whatsapp पर ये दोहे भेजे हैं ,इनमें से कई दवाएं मैं प्रयोग कर भी चुकी हूँ और प्रयोग करवा भी चुकी हूँ , आप भी प्रयोग करें ---

१- दही मथे माखन मिले ,केसर संग मिलाय 
होठों पर लेपित करें ,रंग गुलाबी आय। 

२- बहती यदि जो नाक हो ,बहुत बुरा  हो हाल 
युक्लिप्टस तेल लें ,सूंघे डाल  रुमाल। 

३-अजवाइन को पीस लें ,गाढ़ा लेप लगाय 
चार्म रोग सब दूर हों ,तन कंचन बन जाय। 

४-अजवाइन को  पीस  लें, नीबू संग मिलाय 
फोड़ा- फुंसी दूर हो ,सभी बाला टल जाय। 

५-अजवाइन -गुड खाइये ,तभी बने कुछ  काम 
पित्त रोग में लाभ हो ,पाएंगे आराम। 

६-ठंड लगे  जब आपको , सर्दी से बेहाल 
नीबू -मधु के साथ में ,अदरक पियें  उबाल। 

७- अदरक का रस लीजिये, मधु लेवें सम भाग
नियमित सेवन जब करें सर्दी जाए  भाग। 

८- रोटी मक्के की भली ,खा लें यदि भरपूर 
बेहतर लीवर आपका ,टी बी भी हो दूर। 

९- गाजर रस संग आवला ,बीस औ चालीस ग्राम 
रक्तचाप ह्रदय सही ,पाएं सब आराम। 

१०- शहद, आवला जूस हो, मिश्री सब दस ग्राम 
बीस ग्राम घी साथ में ,यौवन स्थिर काम। 

११- चिंतित  होता क्यों भला ,देख बुढ़ापा रोय 
चौलाई, पालक भली ,योवन स्थिर होय। 

१२- लाल टमाटर लीजिये, खीरा सहित सनेह  
जूस करेला साथ हो ,दूर करे मधुमेह। 

१३- प्रात  संध्या पीजिये ,खाली पेट सनेह 
जामुन गुठली पीसिये नहीं रहे मधुमेह। 

१४-सात पत्र लें नीम के खाली पेट चबाय 
दूर करे मधुमेह को ,सब कुछ मन को भाय। 

१५- सात फूल ले  लीजिये, सुन्दर सदाबहार 
दूर करे मधुमेह को जीवन से हो प्यार। 

१६- छाछ हींग  सेंधा नमक दूर करे सब रोग ,
जीरा  उसमें दाल कर पियें सदा यह भोग। 

१७- अजवाइन लें छाछ संग मात्रा ५ ग्राम 
कीट पेट के नष्ट हों जल्दी  हो आराम। 

१८- तुलसीदल दस लीजिये उठ कर प्रातः काल 
सेहत सुधरे आपकी तन- मन मालामाल। 

१९- अजवाइन और हींग लें  लहसुन  संग पकाय 
मालिश जोड़ों की करें दर्द दूर हो जाय। 

२०- एलोवेरा- आंवला  करे खून में वृद्धि 
उदर- व्याधियां दूर हों जीवन में हो सिद्धि। 

२१- दस्त अगर आने लगे, चिंतित दीखे माथ 
दालचीनी का पावडर लें पानी के साथ।   

२२- कफ से पीड़ित हों अगर,खांसी बहुत सताय 
अजवाइन की भाप लें कफ तब बाहर आय। 

२३-ठंड अगर लग जाय  जो, नहीं बने कुछ काम 
नियमित पी लें गुनगुना पानी दे आराम। 

२४-पीता थोड़ी छाछ जो ,भोजन करके रोज 
नहीं जरुरत वैद्य की, चेहरे पर हो ओज।

२५-मधु का सेवन जो करे ,सुख पावेगा सोय 
कंठ सुरीला साथ में, वाणी मधुरिम होय। 

२६-नीबू बेसन जल शहद मिश्रित लेप लगाय 
 चेहरा सुन्दर तब बने ,बेहतर यही उपाय। 

२७- बीस एम एल रस आंवला, हल्दी हो एक ग्राम 
सर्दी कम तकलीफ में,फ़ौरन हो आराम। 

२८- बीस मिली रस आंवला, ५ ग्राम मधु संग 
सुबह शाम में चाटिये ,बढे ज्योति सब दंग। 

२९- कंचन  काया को कभी ,पित्त अगर दे कष्ट 
घृतकुमारी संग आंवला, करे उसे भी नष्ट। 

३०-मुंह में बदबू हो अगर, दालचीनी मुख डाल 
बने सुगन्धित मुख ,महक दूर होय तत्काल। 

३१-थोड़ा सा गुड लीजिये, दूर रहें सब रोग 
अधिक कभी मत खाइये चाहे मोहनभोग। 

Monday, February 16, 2015

एक अनार सौ बीमार

एक अनार सौ बीमार


बड़ी पुरानी कहावत है - एक अनार सौ बीमार। आखिर ऐसा क्यों कहा जाता है यह जानना भी तो जरूरी है। आइये आज यही जानने की कोशिश करते हैं।
अनार का वैज्ञानिक नाम है- Punica garnatum .इसे संस्कृत में दाड़ी ,गुजराती में दाडम, बंगला भाषा में दारिम ,मराठी में डालिव , कर्नाटक  की भाषा में दार्लिव ,तेलगू में दानिव चेट्टू ,तमिल में मालदेई चेहड्डी, अंग्रेजी में Pomegranate ,और अरबी में रूमान हामिज कहते हैं। हमारे वेदों में इसे कई जगह लोहित पुष्पक के नाम से भी सम्बोधित किया गया है।

अनार के फल में मालवाडीन आर्सेलिक एसिड,केरोटीन सीटोस्टीरॉल, ग्रेनाटिंस ए ,बी ,बेटुलिक एसिड, प्यूनिकाटोलिन , एमीनोएसिड, डाईग्लाइकोसाइड्स, पेन्टासग्लाइकोसाइड्स, निकोटिनिक एसिड ,राइबोफ्लेविन, कार्बोदित, थायमाइन ,विटामिन-सी, डेल्फीनिडीन, साइटोस्टीरॉल जैसे महत्वपूर्ण तत्व अभी तक खोजे गए हैं।

अनार तीन प्रकारके होते हैं- १- मीठा अनार -यह तीनो दोषों का नाश करता है अर्थात शरीर में कफ वात और पित्त को बैलेंस करता है। जिसके कारण शरीर में कोई रोग पनप ही नहीं पाता और मनुष्य निरोगी जीवन जीता है। यह हृदय रोग, कण्ठरोग ,मुंह के रोग, बुखार आदि को ख़त्म करता है। शरीर में बल और वीर्य और बुद्धि को बढ़ाता है लेकिन थोड़ा  कब्ज  पैदा करता है।
२- खट्टा - मीठा अनार ----यह अनार पित्त को बढ़ाता है ,भूख भी बढ़ाता है ,स्वादिष्ट  होता है।
३- खट्टा अनार ---- यह  भी पित्त  बढ़ाता है लेकिन वात और कफ  का नाश भी करता है।
किन बीमारियों में अनार का प्रयोग  कैसे करना चाहिए ,आइये देखें ---
***** दस्त में- अगर लूज मोशन रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं तो अनार  के दाने भून कर उनका रस निकालिये और पी लीजिये।
***** खूनी बवासीर में अनार की छाल का ३ ग्राम चूर्ण मठ्ठे के साथ निगलवा  देना चाहिए।


***** पांचवे महीने में गर्भवती महिला को अनार के पत्तों का  चूर्ण शहद मिलाकर जरूर चाट लेना चाहिए ,इससे गर्भ  स्थिर और मजबूत हो जाता है।
***** अगर मुंह के किसी भाग से खून आ रहा हो तो  अनार  के छिलके के चूर्ण में शहद मिला कर चाटिये। 
***** पेट में फीता कृमि हो गए हैं तो अनार के जड़ का काढ़ा बनाएं, एक -एक घंटे पर एक- एक गिलास पीजिये ,चार गिलास में ही सारे फीता कृमि अंडे- बच्चे समेत मर कर पेट से बाहर हो जाएंगे। 
***** किसी भी वजह से भोजन के प्रति अरुचि हो गयी है तो अनार के रस में सेंधा नमक और शहद मिला कर पीजिये ,बहुत  फायदा होगा।  
***** उपदंश जैसे रोगों में अनार की छाल का चूर्ण काम  करता है। 
***** अतिसार अर्थात बहुत  ज्यादा दस्त  में अनार के छिलके  का काढ़ा भी दे सकते हैं।



इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Sunday, January 4, 2015

शहद : ज्ञान कम,भ्रम ज्यादा

शहद : ज्ञान कम,भ्रम ज्यादा

मधु वाता ऋतायते, मधु क्षरन्ति सिन्धवः 
                                              ------ऋग्वेद 
पौत्तिकं भ्रामरं क्षौद्रं माक्षिकं छात्रमेव च .आर्घ्य मौद्दालिकम दालमित्यष्टौ मधु जातयः .
                                                                              ------ सुश्रुत संहिता 
आयुर्वेद के दो महान ग्रंथों की ये दो पंक्तियाँ ही शहद को परिभाषित करने और उसके भेद बताने के लिए पर्याप्त हैं .मैं अगर व्यक्तिगत रूप से बात करू तो मुझे आज तक शहद का विकल्प नहीं मिला है और चिकित्सक के रूप में मैं तब बहुत दुविधा में पड़ जाती हूँ जब कोई मरीज यह कहता है कि वह जैन है और शहद का सेवन नहीं कर सकता . (मैं  अपने प्रबुद्ध पाठक बंधुओं से यह अपेक्षा रखती हूँ कि वे मुझको जैन धर्म की किसी   सम्मानित पुस्तक का वह अंश जरूर मेल कर दें जिसमें शहद खाने की मनाही की गयी हो ).
शहद एक उत्तम पौष्टिक है .अगर दुर्भाग्यवश आपको कोई रोग हो गया हो और आप किसी भी पद्धति से इलाज करवा रहे हों तो आप अन्य दवाओं के साथ ही एक -एक चम्मच शहद का सेवन भी शुरू कर दीजिये .आप और आपका डाक्टर खुद देखेगा कि आपने बिमारी पर दुगुनी तेजी से काबू पा लिया है .
शहद अनेक प्रकार की शर्कराओं का मिश्रण है .गन्ने की शर्करा, अंगूर की शर्करा, पुष्पों की शर्करा का ऐसा मिश्रण कृत्रिम रूप से नहीं तैयार हो सकता .इसी लिए शहद को नवजात शिशु को माता के दूध के स्थान पर दिया जाता है. पुंकेसरों से उसका महत्वपूर्ण अंश चूस लेने की क्षमता प्रकृति ने सिर्फ मधुमक्खियों को ही प्रदान की है .इसके बावजूद पुष्प को कोई नुक्सान नहीं पहुंचता वह उसी तरह खिला रहता है .जब मनुष्य पुष्पों से तत्व निकालने की कोशिश करेगा तो ,उसका शर्करा तत्व भले निकले या न निकले, पुष्प जरूर ख़त्म हो जाएगा .
शहद को आठ प्रकार का माना गया है .भावप्रकाश   में भी शहद के आठ भेद माने गए हैं जबकि चरक संहिता  में सिर्फ चार प्रकार के शहद का वर्णन है .पौत्तिक शहद विषैली मक्खियों से सम्बंधित होने के कारण विषैला होता है .यह शरीर में रूखापन, वात ,पित्त को बढ़ाता है ,शरीर में जलन उत्पन्न करता है और नशा पैदा करता है .भ्रामर शहद में लसीलापन और अधिक मिठास होती है इसलिए वह अधिक भारी होता है. क्षौद्र मधु विशेषतः शीतल, लघु और लेखनीय माना गया है .अर्थात ये शरीर का सबसे अच्छा दोस्त है, आराम से पच जाता है और लेखनीय गुण  होने से यह मोटापे को भी कम करता है. माक्षिक शहद  सबसे श्रेष्ठ माना गया है .यह विशेषतः श्वास प्रक्रिया में बहुत उपयोगी होता है ,इसको खाने से स्वर भी मधुर होता है .छात्र शहद हिमाचल प्रदेश के वनों की मधुमक्खियों द्वारा निर्मित किया जाता है .इनके छत्ते छाते के आकार  के होते हैं इसलिए ये छात्र शहद कहलाता है इसमें सफ़ेद दाग, प्रमेह और कृमियों को नष्ट करने की विशेष क्षमता होती है . इसे भी गुणों में श्रेष्ठ माना गया है .आर्घ्य शहद अर्घा नामक मधुमक्खियों द्वारा तैयार किया जाता है ,यह आँखों के लिए बहुत फायदेमंद है ,कफ और पित्त को नष्ट करता है ,ताकत देता है , तेज होता है.इसमें थोड़ा कड़वापन भी होता है .औद्दालक शहद स्वादिष्ट, स्वर को मधुर करने वाला ,जहर नष्ट करने वाला और कोढ़ को भी नष्ट करने वाला होता है.दाल शहद की ये विशेषता है की वह किसी भी प्रकार के प्रमेह को ख़त्म कर देगा (मधुमेह भी 20 प्रकार के प्रमेहों में से एक है )यह कुछ खटास लिए होता है इसलिए पित्त भी बढ़ाता है ,गरम होता है रूखापन होता है 
अगर शहद ताजा है तो ताकत देता है ,पेट साफ़ करता है इसे अल्पश्लेष्महर भी माना  गया है .एक साल पुराना शहद बाहर निकले हुए पेट को कम करता है और मोटापे को दूर करता है ,शरीर में पूर्णतया अब्जॉर्ब हो जाता है और अनावश्यक मांस को ख़त्म करता है. छत्ते में अधिक समय तक रहने वाला शहद पक्व शहद माना जाता है ,यह शरीर में तीनो दोषों को नष्ट करके शरीर को स्वस्थ और स्वच्छ बना देता है .इन सबके विपरीत कच्चा शहद एसिडिटी पैदा करता है और तीनो दोषों (वात कफ और पित्त )को बढ़ा देता है .
एक सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि शहद को कभी गरम पेय पदार्थों ,गरम प्रकृति की वस्तुओं ,गरमी से पीड़ित व्यक्तियों, गरम देशों और गरमी के मौसम में प्रयोग नहीं करना चाहिए .ऎसी स्थिति में इसका प्रयोग जहर की तरह घातक हो जाता है .शहद की प्रकृति ठंडी और कोमल मानी गयी है .अनेक प्रकार की औषधियों के पुष्पों के रस से उत्पन्न होने के कारण शहद उष्णता के विरुद्ध होता है .आयुर्वेद वमन कराने के लिए (vomating) शहद का प्रयोग गरम जल के साथ करने की सलाह देता है क्योंकि तब शरीर में यह अब्जॉर्ब नहीं होता न  ही शरीर में टिकता है .सावधानीवश इसे गरम जल के साथ न ही लिया जाए तो बेहतर है क्योंकि अगर वोमेट नहीं हुई और यह शरीर के अंदर ही रह गया तो यह विष के समान प्राणनाशक सिद्ध होगा और अधिक कष्ट देगा .सभी प्राणियों पर ये नियम लागू होगा .
शहद के लिए योगवाहि शब्द का प्रयोग किया जाता है क्योंकि यह अनेक प्रकार के द्रव्यों से मिल कर बनता है और भिन्न भिन्न प्रकार की औषधियों के साथ मिल कर भिन्न भिन्न प्रकार की बीमारियों का नाश करता है.
अब शहद के सामान्य गुणों पर भी निगाह डाली जाए ---

इसके अंदर संधान unity का गुण होता है अर्थात ये हमारी कोशिकाओं को इतनी सख्ती के साथ बांधे रखता है की उनमें किसी प्रकार के विष के प्रवेश की संभावना ही ख़त्म हो जाती है .कैंसर के मरीजों को शहद दिया जाए तो कैंसरस सेल फैलने की प्रक्रिया 90%तक कंट्रोल हो जायेगी .त्वचा भी दृढ़ बनी रहने से झुर्रियों की सम्भावना ख़त्म ,हड्डियों में दृढ़ता रहते से सर्वाइकल, स्लीपडिस्क, गठिया की संभावना ख़त्म .इसका यह संधान वाला गुण सबसे करामाती गुण है .
यह हृदय  के लिए लाभकारी है.
 यह सौंदर्य वर्धक  है .
यह शरीर के बहुत सूक्ष्म कोषों तक भी बहुत तेजी से पहुँच जाता है 
यह वीर्य वर्धक है 
यह आँखों के लिए बहुत लाभदायक है .
यह शरीर में निर्माण की प्रक्रिया तेज करता है 
यह शरीर का शोधन करता है.

वास्तव में शहद अमृत है .


इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Wednesday, December 31, 2014

happy 2015



नयी कला, नूतन रचनाएं, नयी सूझ, नूतन साधन 
नए भाव,  नूतन उमंग से,       वीर बने रहते नूतन। 
                               २०१५ 

इन्हीं भावनाओं के साथ मंगलकामनाएं 

Saturday, December 27, 2014

ये ठंड भला क्यों हमारी दुश्मन बने ?

ये ठंड भला क्यों हमारी दुश्मन बने ?

बहुत मामूली सी गलती होती है और ठंड लग जाती है। अगर हम ज़रा सावधान रहें तो ऐसा नहीं होगा। सबसे पहले ठंड लगने के सामान्य लक्षण जान लीजिये -
१- लूज मोशन आना 
२- सिर में मीठा मीठा दर्द 
३- भोजन में नमक या कोई स्वाद कम महसूस होना 
४- सुस्ती 
५- समूह में बैठने की इच्छा होना। 

इनमे से कोई लक्षण प्रकट हो तो दो काम तुरंत कीजिए -
१- पानी को खूब तेज गरम कीजिए ,उसमें २ चम्मच नमक मिलाएं फिर उस पानी में पहले एड़ी फिर धीरे धीरे पूरा पंजा डूबा कर २० मिनट बैठे रहें ,यह क्रिया दिन में दो बार कीजिए। 
२- एक बड़ा चम्मच अजवाइन से भरिये ,फिर वह अजवाइन मुंह में रख कर पानी पी जाइए ,चबाना नहीं है अजवाइन को ,केवल निगलना है। 

दो से तीन दिन में ही सर्दी से उत्पन्न सभी परेशानियां ख़त्म हो जाएंगी। 

सर्दी या गरमी तभी परेशान करते हैं जब आपके शरीर की इम्यूनिटी कमजोर हो गयी हो। उसको बनाये रखने के लिए आप २-४ चीजों का सहारा लीजिए। एक महीने ६ ग्राम अश्वगंधा चूर्ण रोज पानी से निगलिये ,दूसरे महीने ५ ग्राम हल्दी चूर्ण ,तीसरे महीने ५ छोटी हर्रे का चूर्ण। सुबह सवेरे नाश्ते से ५ मिनट पहले निगलना है। चौथे महीने फिर अश्वगंधा से क्रम शुरू कीजिए। विश्वास  कीजिए साल भर में एक बार भी डाक्टर के पास जाने की जरुरत नहीं पड़ेगी।  यही नहीं आप सारे मौसमों का भरपूर आनंद उठाएंगे। 



Thursday, November 13, 2014

माजूफल एक चमत्कारी फल है


वैसे तो कुदरत का करिश्मा मामूली सी घास में भी छिपा हुआ है ,ये हमारी ही कमी है कि हम पहचान नहीं पाते एक अनोखा सा फल है माजूफल--इसको अंग्रेजी में Gallnut कहते हैं और वैज्ञानिक भाषा में Quercus infecttoria .


इसको gallnut कहते हैं। 
यह दाँतो का बहुत माहिर डाक्टर है। दाँतो में कैसी भी परेशानी हो ,पानी लगता हो ,पायरिया हो, मसूढ़ों से खून आता हो या दर्द होता हो ,दांत कमजोर हैं या दाँतो से भी खून आता है तो आप घर पर ही ये मंजन बना सकते हैं--इसके लिए चाहिए बस माजूफल और छोटी छोटी घरेलू चीजें। एक माजूफल को बारीक पीसकर सरसो  के तेल में मिलाकर बस मसूढ़ों पर मालिश कीजिए इससे मसूढ़ों का दर्द और खून आना तो बंद होगा ही दांत भी मजबूत हो जाएंगे। दाँतो में बहुत तेज दर्द हो रहा है तो माजूफल का चूर्ण उस दांत के नीचे दबाएं १० मिनट में ही दर्द गायब हो जाएगा। एक भुनी हुई  सुपारी और एक भुना हुआ माजूफल और एक कच्चा माजूफल इन तीनो को महीन पीसकर मंजन बनाकर तो हमेशा घर  में रखना चाहिए और हो सके तो रोज या फिर सन्डे सन्डे इससे जरूर मंजन करना चाहिए ताकि दाँतो में कोई रोग लगे ही  न। दांत बहुत तेज दर्द कर रहा हो तो भुनी हुई फिटकरी ,हल्दी और माजूफल २५-२५ ग्राम ले लीजिये और पीस कर चूर्ण बना लीजिये ,इससे दो बार मंजन करने से ही दर्द गायब हो जाएगा।  


एक अजीब सी बीमारी है मलद्वार का बाहर निकलना। यह कई कारणों से होता है। कब्ज हो तो मल त्यागते समय व्यक्ति जोर लगाता है। लगातार पेट साफ़ करने वाली  दवाएं खाने से भी मलद्वार बाहर निकल जाता है। बवासीर और भगन्दर हो तो भी ऐसा हो जाता है। खैर किसी भी कारण से मलद्वार बाहर निकला हो तो आप माजूफल की शरण में जाइए। १ गिलास पानी में एक माजूफल पीस कर डालिये फिर इसे पकाइये। १० मिनट उबलने के बाद उतार कर ठंडा कीजिए और इसी पानी से मलद्वार की धुलाई कीजिए। बवासीर के मस्सों का दर्द ,भगन्दर का दर्द और मलद्वार का बाहर निकलना तीनो में आराम मिलेगा। यह क्रिया ५-६ दिनों तक लगातार   कीजिए।
मलद्वार से ही सम्बंधित एक बीमारी है गुदाभ्रंश। यह बच्चों में ज्यादा होती है। इसके लिए आप आधा चम्मच फिटकरी लीजिये उसको भून  कर चूर्ण बनाये फिर दो माजूफल पीस कर चूर्ण बनाएं। अब दोनों के चूर्ण को १०० ग्राम पानी में मिलाएं। दवा तैयार है। अब इस दवा में रूई का मोटा टुकड़ा भिगाए और गुदा पर बाँध लीजिये। एक क्रिया आपको १०-१५ दिन करनी पड़ सकती है।जितना पुराना रोग होगा उतना ही अधिक समय लेगा ठीक होने में ,किन्तु ठीक अवश्य हो जाएगा।


यदि अंडकोष में पानी भर गया है या फिर चोट आदि लगने से सूजन आ गयी है तो फिर माजूफल आपका सच्चा साथी साबित होगा। पानी भरने की दशा में १० ग्राम माजूफल और ५ ग्राम फिटकरी पानी में महीन पीस कर पेस्ट बना लीजिये फिर अंडकोष पर लेप करके १ घंटे तक छोड़ दीजिये तत्पश्चात सादे पानी से धो लीजिये। कम से कम २१ दिन यह काम करने से पानी सूख जाएगा। अगर सूजन हो गयी है तो १०-१० ग्राम माजूफल और अश्वगंधा लीजिये ,पानी में पीस कर पेस्ट बनाइये, फिर थोड़ा गरम कीजिए और सुहाता सा लेप करके कोई कपडा बाँध लीजिये ३-४ दिन में भी सूजन उत्तर सकती है और १० दिन भी लग सकते हैं। 

माजूफल का चूर्ण १०-१० ग्राम सुबह शाम गाय के दूध से निगलने से गर्भ धारण में सहायता मिलती है। यह प्रक्रिया चार  से पांच माह लगातार करनी होगी। उसके पहले गर्भाशय को कलौंजी के काढ़े से शुद्ध कर लेना चाहिए।  

माजूफल ल्यूकोरिया की भी दवा है। एक-एक ग्राम चूर्ण सुबह शाम पानी से खाया जाता है। २१ दिन तक। 

अगर आपको पतले होंठ पसंद हैं तो माजूफल  को दूध में पीसकर पेस्ट बनाइये और होठों पर लगाकर सो जाएँ। ११ दिन में ही होठ पतले हो जाएंगे।

माजूफल का लेप लगाकर बांधने से टूटी हुई हड्डी भी जुड़ जाती है।  

माजूफल का छोटा सा टुकड़ा चूसते रहने से मुंह के छाले  भी नष्ट हो जाते हैं। 

   

Sunday, November 2, 2014

अमरता और देवत्व हासिल होते है जडी- बूटियो से ही


आज मेरे लिए एक ख़ास दिन है इस दिन को मैं और ख़ास बनाना चाहती हूँ आप सभी को एक ख़ास जानकारी देकर। मुझे यह जानकारी कुछ दिनों पूर्व धनतेरस के शुभ दिन भगवान धन्वंतरि की महान कृपा से मिली। 
हम अभी तक देवताओं और अमरत्व के बारे में सुनते आये ,किसी कहानी की तरह।  अपनी धार्मिक किताबों में पढ़ते भी आये। लेकिन हमारा ये साईंटिफिक युग का दिमाग साथ ही साथ यह  भी यही सोचता रहा कि  हाँ "दिल को बहलाने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है".  
लेकिन अब मुझे तो विश्वास हो गया कि सचमुच यह सम्भव है। महान शल्य चिकित्सक सुश्रुत ने ऎसी जड़ी-बूटियों के बारे में बहुत कुछ लिखा है। 
कुल अट्ठारह जड़ीबूटियों के बारे में बताया है कि  इन्हें खाने से (एक ख़ास विधिपुरक इनका सेवन करने से ) मनुष्य दो हजार साल तक जीवित रह सकता है ,पलक झपकते ही कहीं भी आ-जा सकता है।अबाध गमन और श्रुतनिगदि अर्थात एक बार सुने को हमेशा याद रखने वाला (पावरफुल मेमोरी) बलवान और निरोग तो हो ही जायेगा ,बुढ़ापे का कोई लक्षण नहीं आएगा। इनके नाम हैं- अजगरी, श्वेत कापोती, कृष्ण कापोती, गोंसी, वाराही, कन्या, छत्रा, अतिच्छत्रा, करेणु, अजा, चक्रका, आदित्यपर्णिनी, ब्रह्मसुवर्चला, श्रावणी,महाश्रावणी, गोलोमी, अज्लोमी, महावेगवती।

२४ तरह की ऎसी सोमलताओं का वर्णन है जिनसे सोमरस निकलता है जिनका एक ही बार ख़ास विधि से सेवन करना होता है और दो माह तक नज़रबंद रहना होता है अर्थात एक ख़ास तरह से जीवन बिताना होता है। इस दो माह की कठिन तपस्या के बाद देवत्व आपके अंदर आ जाएगा। सशरीर वायु में बेरोकटोक गमन कीजिए। १००० हाथियों का बल आपके अंदर आ जाएगा। भूख, प्यास, नींद, बुढ़ापा आपकी मर्जी के गुलाम होंगे। १० हजार साल तक आपकी उम्र बढ़ जायेगी। इतने खूबसूरत हो जाएंगे की देखते ही लोग देवता समझ लेंगे। इनके नाम इस तरह हैं---अंशुमान, मुंजवान, चन्द्रमा, राजत्प्रभ, दूरवासोम, कांईयां, श्वेताभ, कनकप्रभ, प्रातांवां, तालवृन्त, करवीर, अनश्वान्, स्वयंप्रभ, महासोम, गरुणाहृत, गायत्र, त्रैष्टुभ, पांक्त, जागत, शाकवर, अग्निष्टोम, रैवत, त्रिपदागायत्री, उडुपति। 
लेकिन महर्षि सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता में यह भी बताया है की यह दिव्य औषधियां  उन्ही लोगों को दिखती हैं जो धार्मिक, अकृतघ्न, औषधि पर विश्वास रखने वाले और बुजुर्गों का सम्मान करने वाले होते हैं। 
सात तरह के व्यक्तियों को इन रसायन के सेवन के अयोग्य माना गया है-
अनात्मवान् 
आलसी
 दरिद्र
प्रमादी 
व्यसनी 
पापी 
और औषधि पर विश्वास न रखने वाला।  

और अब मैंने यह संकल्प कर लिया है की मैं इन्हे खोज कर ही रहूंगी ताकि इनका लाभ पूरी मानवता को मिल सके। 

Friday, September 12, 2014

हकलाते हैं ,तो तेजपत्ते का सेवन कीजिए




अक्सर हमें पुलाव बिरयानी की प्लेट में तेजपात नज़र आता है जिसे हम बड़े करीने से किनारे कर देते हैं। आपको पता है कि ये बहुत चमत्कारी औषधि है !
इसका पेड़ पचीस फुट तक ऊँचा होता है और इस पर पीले रंग के फूल लगते हैं। इसमें रासायनिक खोज करने पर तीन तरह के तेल पाए गए हैं। उतपत्त तेल ,यूजीनाल और आइसो यूजीनाल। इसे हिन्दी में तेजपात और संस्कृत में तमालपत्र कहते हैं। इसे वैज्ञानिक भाषा में Cinnamomum tamala कहते हैं। 

       आइये इसके औषधीय गुणों पर दृष्टिपात करें -

दमा में ---तेजपात ,पीपल,अदरक, मिश्री सभी को बराबर मात्र में लेकर चटनी पीस  लीजिए।१-१ चम्मच चटनी रोज खाएं ४० दिनों तक। फायदा सुनिश्चित है। 

दांतों के लिए ---सप्ताह में तीन दिन तेजपात के बारीक चूर्ण से मंजन कीजिए। दांत मजबूत होंगे, दांतों में कीड़ा नहीं लगेगा ,ठंडा गरम पानी नहीं लगेगा , दांत मोतियों की तरह चमकेंगे। 

कीड़े से बचाने के लिए ----कपड़ों के बीच में तेजपात के पत्ते रख दीजिए ,ऊनी,सूती,रेशमी कपडे कीड़ों से बचे रहेंगे। अनाजों के बीच में ४-५ पत्ते डाल दीजिए तो अनाज में भी कीड़े नहीं लगेंगे। उनमें एक दिव्य सुगंध जरूर बस जायेगी। 

शारीरिक दुर्गन्ध ----- अनेक लोगों के मोजों से दुर्गन्ध आती है ,वे लोग तेजपात का चूर्ण पैर के तलुवों में मल कर मोज़े पहना करें। पर इसका मतलब ये नहीं कि आप महीनों तक मोज़े धुलें ही न। वैसे भी अंदरूनी कपडे और मोज़े तो रोज धुलने चाहिए। मुंह से दुर्गन्ध आती है तो तेजपात का टुकड़ा चबाया करें। बगल के पसीने से दुर्गन्ध आती है तो तेजपात का चूर्ण पावडर की तरह बगलों में लगाया करें। 

आँखों की रोशनी ----- अगर अचानक आँखों कि रोशनी कुछ कम होने लगी है तो तेजपात के बारीक चूर्ण को सुरमे की तरह आँखों में लगाएं। इससे आँखों की सफाई हो जायेगी और नसों में ताजगी आ जायेगी जिससे आपकी दृष्टि तेज हो जायेगी। इस प्रयोग को लगातार करने से चश्मा भी उतर सकता है। 

गैस -----पेट में गैस की वजह से तकलीफ महसूस हो रही हो तो ३-४ चुटकी या ४ मिली ग्राम तेजपात का चूर्ण पानी से निगल लीजिए। एसीडिटी की तकलीफ में इसका लगातार सेवन बहुत फायदा करता है और पेट को आराम मिलता है। 

हार्ट प्राब्लम ----- तेजपात का अपने भोजन में लगातार प्रयोग कीजिए ,आपका ह्रदय मजबूत बना रहेगा ,कभी हृदय रोग नहीं होंगे। 

पागलपन -----एक एक ग्राम तेजपात का चूर्ण सुबह शाम रोगी को पानी या शहद से खिलाएं।या तेजपात के चूर्ण का हलुआ बनाकर खिलाएं। सूजी के हलवे में एक चम्मच तेजपात का चूर्ण डाल दीजिए। बन गया हलवा।  

हकलाना ---- तेजपात के टुकड़ों को जीभ के नीचे रखा रहने दें ,चूसते रहे। एक माह में हकलाना खत्म हो जाएगा। 

जुकाम ---- दिन में चार बार चाय में तेजपत्ता उबाल कर पीजिए ,जुकाम-जनित सभी कष्टों में आराम मिलेगा।
या चाय में चायपत्ती की जगह तेजपत्ता डालिए। खूब उबालिए ,फिर दूध और चीनी डालिए।  

पेट दर्द ---- पेट की किसी भी बीमारी में तेजपत्ते का काढा बनाकर पीजिए। दस्त, आँतों के घाव, भूख न लगना सभी में आराम मिलेगा।  
      
इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा