आयुर्वेद का अर्थ औषधि - विज्ञान नही है वरन आयुर्विज्ञान अर्थात '' जीवन-का-विज्ञान'' है

Followers

Thursday, March 15, 2018

एक प्रस्ताव आपको स्वस्थ रखने के लिए

हमारे देश मे सबसे सस्ता अपने शरीर को समझा जाता है।अगर किसी रोग के इलाज पर 4-5000 रु खर्च होते हों तो व्यक्ति इलाज नही कराता।उसकी सोच होती है कि अभी तो चल रहा है न, छोड़ो, बाद में देखेंगे।जबकि आयुर्वेद का उदय शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए हुआ था।बीमारियों के इलाज की स्थिति शायद ही कभी पैदा होती थी।क्योंकि हर आदमी अपने शरीर की शक्ति और क्षमता को निरंतर जड़ी बूटियों से बढ़ाता रहता था।
अब ऐसी जड़ी बूटियां सहज सुलभ नही हैं।तो काम के बोझ से परेशान हम लोग अतिरिक्त काम करने की बिल्कुल इच्छा नही रखते।
मैंने इसका उपाय सोचा है।आपको पसंद आये तो जरूर करें।शक्ति और क्षमता बढ़ाने में जो रसायन कारगर हैं वो है हल्दी रसायन ,निर्गुन्डी रसायन, भिलावा रसायन, पीप्पली रसायन,आमलकी रसायन और बहेड़ा रसायन।लेकिन ये सब महंगे हैं।सबसे सस्ता भी 2000 का होता है।
यदि आप वर्ष के 12 महीनों तक 12 तरह की रसायन और दवाएं खा लें तो आपको अपने शरीर में युवाओं वाली चुस्ती फुर्ती स्फूर्ति महसूस होगी।जो काफी लंबे समय तक कायम रहेगी।
इसके लिए आपको हर महीने केवल 1000 रु खर्च करने होंगे।हर महीने आपको एक नया रसायन या नया आयुर्वेदिक योग मिलेगा।जो आपके कफ, वात ,पित्त, पेट, गैस, हार्ट ब्लॉकेज, कोलेस्ट्रॉल, बी पी आदि को कंट्रोल करके आपको पूर्णतया रोगरहित कर देगा।
अगर आपको यह प्रस्ताव पसंद हो तो फोन कीजिये।
अलका मिश्रा
9170702195
9889478084

Tuesday, February 13, 2018

एक सामाजिक मुद्दा

सभी पूज्यनीय महात्मा, साधक, मंत्र विशेषज्ञ, तंत्र विशेषज्ञ, पुजारी, पण्डित एवं ज्ञानी जन से हाथ जोड़कर एक जिज्ञासा का समाधान चाहती हूं------मान लीजिये हम कोई पूजा, किसी देवी देवता की आराधना कर रहे हैं और वह पूजा हमें नुकसान पहुंचा रही है तो उसकी काट क्या होगी।                 जैसे मैं आयुर्वेद का थोड़ा बहुत ज्ञान रखती हूं । मैंने आपको कोई जड़ी बूटी या दवा लीवर सही करने के लिए दी।उस दवा ने लीवर तो सही किया नही, बल्कि अच्छी खासी किडनी खराब कर दी। लक्षण पता चलते ही उस दवा की काट दे दी गयी तो नुकसान की भरपाई हो गयी। जो जड़ी बूटियां जीवन बचाती हैं वही कभी कभी जीवन खत्म भी कर देती हैं ।ठीक इसी तरह पूजा साधना मंत्रो की भी स्थिति है।आप ऐं मन्त्र का जप कर रहे हैं माँ सरस्वती के लिए ।कहीं ऐसा हो कि ज्ञान तो मिल नहीं चलने की शक्ति और खत्म हो गयी।तो इसकी काट का पता होना चाहिए।जैसे भांग खाने वाले नीबू या अमरूद रखे रहते हैं कि अगर ज्यादा चढ़ गई चक्कर वगैरा आने लगे तो उसकी काट नीबू या अमरूद तुरंत खा लेंगे।।                             तो प्लीज पूजा साधना न सहने पर उसकी काट की जानकारी जिन्हें हो, कृपया मुझे बताएं।
////////////////////////////////////
जी शायद आप मेरी तकलीफ के सबसे ज्यादा निकट पहुंच गए हैं।जब खुद को तकलीफ होती है तो दूसरे की पीड़ा समझ मे आती है।मुझे सैकड़ो लोग मिले होंगे जो बताते है बहुत अनुष्ठान करा लिए, अनेक पंडितो से मिल आये ,कोई रिजल्ट नही मिला।और अनेको का विश्वास ही पूजा पाठ से हट जाता है ।जितनी दलीलें यहां  है न ,मैं भी ऐसे ही बताती रही हूं कि मंत्रो में बड़ी शक्ति है बशर्ते सही ढंग से पढ़ा जाए। मन्त्र है ॐ नमः शिवाय ।लोग पढ़ते है ॐ नमः सिवाय।शिवाय का अर्थ है कल्याण के लिये।सिवाय का अर्थ हुआ अतिरिक्त या अलावा।तो फल भी तो गलत ही मिलेगा।
यह समझाने की चीज तो है और सत्य भी किन्तु अब सुंदरकांड का पाठ करना नुकसान दे रहा है तो क्या करें।हनुमान जी को फल फूल चढ़ाना नुकसान दे रहा है तो क्या करें।

सोचिये और मनन करके ठोस मार्ग खोजिये। वरना हम अपने धर्म और मंत्रो को इज्जत नही दिल पाएंगे।पंडितो की तो वैसे ही समाज हंसी उड़ा रहा है।

Tuesday, February 6, 2018

छोटे छोटे नुस्खे

[22:45, 14/12/2017]

महिलाओं के लिए एक अमृत नुस्खा ----

आधा किलो पानी उबाल कर ठंडा कर लीजिए, फिर उसमें 7 या 8 चम्मच चीनी, 1 चम्मच नमक और 3 नींबू का रस मिला दीजिये। ठीक 12 बजे दोपहर में आधा रस पीएं और बाकी आधा ठीक एक घण्टे बाद।
जिन्हें यूरीन संबंधी शिकायत है वे लोग इस मिश्रण में एक चम्मच जीरा भून कर पीस कर मिला लीजिए।
यह पेय होली आने तक रोज पीएं।फिर खुद में अद्भुत शक्ति का एहसास करें, जो पूरे वर्ष बनी रहेगी।आपकी 50 प्रतिशत बीमारियां इसी से खत्म हो जाएंगी।

: सर्दी के मौसम में सबसे बड़ी परेशानी है --- पैर और एड़ियां फटना/खुरदुरा होना।वैसे तो यह स्थिति गालों और हथेलियों के पिछले हिस्से की भी होती है।पर पैर इसलिए ज्यादा परेशान करते हैं क्योंकि ये कम्बल और रजाई में फँसते हैं।
इसका घरेलू उपाय है 25 ग्राम देसी घी का रोज प्रयोग कीजिये, 2 दिन में फर्क मिलेगा।
आयुर्वेदिक उपाय अश्वगंधा और दालचीनी का चूर्ण 3-3 ग्राम लीजिये और 1 गिलास पानी मे 20 मिनट तक उबालकर गुड़ या शहद मिलाकर रोज पीजिये।

[09:16, 01/01/2018] आइये नवीन वर्ष 2018 की शुरुआत दही चीनी खाकर की जाए।
यदि आप प्रतिदिन केवल 2 चम्मच दही शक्कर मिला कर खाएंगे तो आपका लीवर बिल्कुल दुरुस्त हो जाएगा।
गैस, बदहजमी, भूख न लगना, कब्ज, आदि इत्यादि पेट की दिक्कतें स्वतः दूर होती चली जायेगी।
मीठी दही लीवर के लिए टॉनिक है, यह आयुर्वेद का प्राचीनतम सिद्धांत है।
मीठी दही नए काम को शुरू करने का शुभ सगुन तो है ही।
आपका स्वास्थ्य अच्छा रहे यही मेरी मंगलकामना है।

[10:00, 06/01/2018] : ठंड की वजह से लूज मोशन या खांसी बुखार हो तो तेज गरम पानी में 2 चम्मच नमक डालिये और इस पानी मे पैर डूबा कर 10 मिनट से 20 मिनट बैठे रहिये।
तुरंत आराम महसूस कीजिये।

[17:03, 11/01/2018]  आपके आधे रोगों की जड़ है कोलेस्ट्रॉल।

आइये सबसे पहले इसी को खत्म करें ताकि ठण्ड के मसालेदार और स्वादिष्ट भोजन का भरपूर आनंद ले सकें।

शुद्ध जड़ी बूटियों का मिश्रण तैयार किया है मैंने।आवश्यकता महसूस हो तो प्रयोग कीजिये।
9170702195

[09:55, 13/01/2018]  नवजात शिशुओं के सिर के बाल(थोड़े से) और नाभिनाल हमेशा सहेजकर और सुरक्षित रखने चाहिए यह स्टेम सेल की तरह काम करते हैं अर्थात बहुत कीमती होते हैं।
हालांकि मैं आयुर्वेद से हूँ, लेकिन एलोपैथ वैज्ञानिकों को इस दिशा में काम करना चाहिए।यह दुर्घटना या अंगभंग के समय बहुत काम आएंगे।

[21:05, 17/01/2018] हमारे शरीर में मुख्यतः 3 द्वार हैं।एक जिससे हम भोजन ग्रहण करते हैं ,शेष दो जिनसे हम अपशिष्ट बाहर निकालते हैं।यदि आप नित्य इन द्वारों को साबुन/शैम्पू से धोते हैं और बेहतर तरीके से साफ करते हैं तो आप कई तरह के इंफेक्शन और 3 तरह के कैंसर से हमेशा बचे रहेंगे। प्रोस्टेट/यूट्रस कैंसर, पाइल्स/फिस्टुला, बड़ी आंत का कैंसर।

[10:06, 23/01/2018]
आपके दांत

वाकई जब दांतों में जान रहेगी तब तो आप इतने सारे स्वादिष्ट भोज्य पदार्थों का आनंद उठा पाएंगे।बाजार में इतने सारे टूथपेस्ट और टूथ पावडर हैं ,किन्तु अकेले सफेद कनेर के पेड़ की दातुन उन सब पर भारी है, आपको मिल जाये तो जरूर हफ्ते में 2 बार सफेद कनेर की टहनी से दातुन कीजिये।
या जरूरत समझे तो मुझसे संपर्क कर लीजिए।
[23:21, 26/01/2018]

नींद

जिनको सहज रूप से नींद नही आती है वे लोग 25 ग्राम सौंफ को 250 ग्राम पानी मे 15 मिनट ढक कर उबालें और शाम की चाय के वक्त पी लिया करें।

छोटे छोटे नुस्खे

[22:45, 14/12/2017]

महिलाओं के लिए एक अमृत नुस्खा ----

आधा किलो पानी उबाल कर ठंडा कर लीजिए, फिर उसमें 7 या 8 चम्मच चीनी, 1 चम्मच नमक और 3 नींबू का रस मिला दीजिये। ठीक 12 बजे दोपहर में आधा रस पीएं और बाकी आधा ठीक एक घण्टे बाद।
जिन्हें यूरीन संबंधी शिकायत है वे लोग इस मिश्रण में एक चम्मच जीरा भून कर पीस कर मिला लीजिए।
यह पेय होली आने तक रोज पीएं।फिर खुद में अद्भुत शक्ति का एहसास करें, जो पूरे वर्ष बनी रहेगी।आपकी 50 प्रतिशत बीमारियां इसी से खत्म हो जाएंगी।

: सर्दी के मौसम में सबसे बड़ी परेशानी है --- पैर और एड़ियां फटना/खुरदुरा होना।वैसे तो यह स्थिति गालों और हथेलियों के पिछले हिस्से की भी होती है।पर पैर इसलिए ज्यादा परेशान करते हैं क्योंकि ये कम्बल और रजाई में फँसते हैं।
इसका घरेलू उपाय है 25 ग्राम देसी घी का रोज प्रयोग कीजिये, 2 दिन में फर्क मिलेगा।
आयुर्वेदिक उपाय अश्वगंधा और दालचीनी का चूर्ण 3-3 ग्राम लीजिये और 1 गिलास पानी मे 20 मिनट तक उबालकर गुड़ या शहद मिलाकर रोज पीजिये।

[09:16, 01/01/2018] आइये नवीन वर्ष 2018 की शुरुआत दही चीनी खाकर की जाए।
यदि आप प्रतिदिन केवल 2 चम्मच दही शक्कर मिला कर खाएंगे तो आपका लीवर बिल्कुल दुरुस्त हो जाएगा।
गैस, बदहजमी, भूख न लगना, कब्ज, आदि इत्यादि पेट की दिक्कतें स्वतः दूर होती चली जायेगी।
मीठी दही लीवर के लिए टॉनिक है, यह आयुर्वेद का प्राचीनतम सिद्धांत है।
मीठी दही नए काम को शुरू करने का शुभ सगुन तो है ही।
आपका स्वास्थ्य अच्छा रहे यही मेरी मंगलकामना है।

[10:00, 06/01/2018] : ठंड की वजह से लूज मोशन या खांसी बुखार हो तो तेज गरम पानी में 2 चम्मच नमक डालिये और इस पानी मे पैर डूबा कर 10 मिनट से 20 मिनट बैठे रहिये।
तुरंत आराम महसूस कीजिये।

[17:03, 11/01/2018]  आपके आधे रोगों की जड़ है कोलेस्ट्रॉल।

आइये सबसे पहले इसी को खत्म करें ताकि ठण्ड के मसालेदार और स्वादिष्ट भोजन का भरपूर आनंद ले सकें।

शुद्ध जड़ी बूटियों का मिश्रण तैयार किया है मैंने।आवश्यकता महसूस हो तो प्रयोग कीजिये।
9170702195

[09:55, 13/01/2018]  नवजात शिशुओं के सिर के बाल(थोड़े से) और नाभिनाल हमेशा सहेजकर और सुरक्षित रखने चाहिए यह स्टेम सेल की तरह काम करते हैं अर्थात बहुत कीमती होते हैं।
हालांकि मैं आयुर्वेद से हूँ, लेकिन एलोपैथ वैज्ञानिकों को इस दिशा में काम करना चाहिए।यह दुर्घटना या अंगभंग के समय बहुत काम आएंगे।

[21:05, 17/01/2018] हमारे शरीर में मुख्यतः 3 द्वार हैं।एक जिससे हम भोजन ग्रहण करते हैं ,शेष दो जिनसे हम अपशिष्ट बाहर निकालते हैं।यदि आप नित्य इन द्वारों को साबुन/शैम्पू से धोते हैं और बेहतर तरीके से साफ करते हैं तो आप कई तरह के इंफेक्शन और 3 तरह के कैंसर से हमेशा बचे रहेंगे। प्रोस्टेट/यूट्रस कैंसर, पाइल्स/फिस्टुला, बड़ी आंत का कैंसर।

[10:06, 23/01/2018]
आपके दांत

वाकई जब दांतों में जान रहेगी तब तो आप इतने सारे स्वादिष्ट भोज्य पदार्थों का आनंद उठा पाएंगे।बाजार में इतने सारे टूथपेस्ट और टूथ पावडर हैं ,किन्तु अकेले सफेद कनेर के पेड़ की दातुन उन सब पर भारी है, आपको मिल जाये तो जरूर हफ्ते में 2 बार सफेद कनेर की टहनी से दातुन कीजिये।
या जरूरत समझे तो मुझसे संपर्क कर लीजिए।
[23:21, 26/01/2018]

नींद

जिनको सहज रूप से नींद नही आती है वे लोग 25 ग्राम सौंफ को 250 ग्राम पानी मे 15 मिनट ढक कर उबालें और शाम की चाय के वक्त पी लिया करें।

Thursday, September 7, 2017

यूँ अच्छे होंगे मुंह के छाले, घाव

मेहंदी सावन भादो में बहुत हरी भरी रहती है।ये बहुत काम आ सकती है, उन लोगों के, जिनके मुंह में अक्सर कटे फ़टे का घाव या छाले बने रहते हैं।या जीभ में घाव रहता हो या जिनके दांत और मसूड़े अक्सर दर्द करते हैं।
थोड़े से मेहंदी के पत्ते एक गिलास पानी में 10 मिनट तक ढक के उबालिये ।फिर ठंडा करके इस काढ़े को 2 मिनट तक मुंह मे रखिये फिर थूक दीजिये।
3 या 4 बार कीजिये।
पहले दिन 50 प्रतिशत आराम नजर आएगा।
3 दिन कर लीजिए।

Friday, August 11, 2017

जो गत माह व्हाट्सएप्प पर लिखा

पथरी

पत्थरचट्टा, जिसे पाषाणभेद भी कहते हैं, यह पथरी नही दूर करता सिर्फ पथरी का दर्द दूर करता है।

-------------/------------------
जठराग्नि को तेज करने के लिए

भोजन के बाद सौंफ मिश्री अब बंद कर देनी चाहिए ।पूरे देश के पेट के मरीजों की तकलीफ का विश्लेषण करके मैंने यह नतीजा निकाला है कि अपने पेट की उपापचय की क्रिया अर्थात जठराग्नि को सही रखने के लिए जरूरी है कि भोजन के बाद 10 तुलसी के पत्ते 4 दाने काली मिर्च और सिर्फ एक पीपल का पत्ता चबाया जाना चाहिए।
लीवर की लाइन एवं लेंथ बिल्कुल दुरुस्त हो जाएगी।एक माह लगातार ले लीजियेगा उसके बाद गैप भी हो जाये तो चिंता की बात नही।
इसे चूर्ण बनाकर भी रखा जा सकता है।

---------------------------------
गैस का इलाज

अगर आप एसिडिटी, गैस, पेट की समस्या से पूर्णतया छुटकारा चाहते हैं तो अपनी रसोई में एक छोटा सा बदलाव करें।
दाल, सब्जी आदि जिन भी भोज्य पदार्थ को छौंक लगाई जाती है उस छौंक में सौंफ जरूर डाली जाए।चाहे जिस चीज से छौंके लेकिन सौंफ जरूर जरूर और जरूर जलनी चाहिए।एक सप्ताह बाद ही घर के सभी मेम्बर को राहत मिलनी शुरू हो जाएगी।

----------------------------------
हड्डियों में फ्रैक्चर

जिनकी हड्डियों में किसी वजह से फ्रैक्चर हुआ हो या माइनर फ्रैक्चर हुआ हो वे पुराने चावल बना कर खाएं।पुराने चावलों में हड्डी जोड़ने की अद्भुत क्षमता होती है।ऐसा महान वैद्य सुश्रुत का कहना है।अतः अकाट्य है।

--------------------------------
डेंगू,चिकनगुनिया से बचाव

सावन अपनी रिमझिम फुहारों के साथ बहार पर है,किन्तु सावधान मच्छरों से होने वाले रोग भी अपनी पराकाष्ठा पर हैं। इसलिए डेंगू, चिकनगुनिया, स्वाइन फ्लू, इंसेफेलाइटिस आदि इत्यादि रोगों से बचने के लिए रोज कलौंजी अर्थात मंगरैला से दाल, सब्जी आदि में छौक जरूर लगाएं बल्कि 20 दाने कलौंजी के यूं ही चबा के खा लें ।बच्चे बूढ़े सभी।

---------------------------------
हमारा शरीर

शरीर मे 7 धातुएं होती हैं---
वात
पित्त
कफ
मल (पुरीष )
मूत्र
रक्त
वीर्य
ये सभी प्राण वायु को ताकत प्रदान करती हैं।अतः सभी की उचित मात्रा शरीर मे बनी रहनी चाहिए।

------------------------------
गठन में दर्द का इलाज

शरीर में कहीं भी गठान हो जाये और दर्द करती हो तो उस पर काले तिल पानी में पीस कर लेप कीजिये,थोड़ा मोटा लेप।जौ भी पीस कर लेप लगा सकते हैं।यह बहुत फायदा करता है ।अंदर ही अंदर दूषित रक्त को बिखेर देता है।
यह लेप ऐसे घाव में भी फायदा देगा जो जल्दी ठीक न हो रहा हो।

----------------------------------
पेट अंदर करने की सालिड दवा

पेट समतल करना है ?
3 महीने के फुल कोर्स का खर्च 24000 मात्र ।
शुद्ध आयुर्वेदिक।
न लूज मोशन , न परहेज।

-------------------------------
एसिडिटी और नपुंसकता

एसिडिटी की दवा खाने वाले के प्रजनन अंग शिथिल हो जाते हैं, अतः कामेच्छा खत्म या कम हो जाती है।
अतः एसिडिटी की दवा से बचना ही बुद्धिमानी है।
---------------------------------

वैद्यों से

यह लेख मैं उन विद्वान वैद्यों के लिए लिख रही हूँ, जो दर्जनों जड़ी बूटियों को मिला कर किसी रोग की दवा बनाने की विधि व्हाट्सएप्प पर पोस्ट करते रहते हैं।ज्यादा मिश्रण का प्रभाव क्या होता है यह ऊपर पुस्तक के पृष्ठ में स्पष्ट लिखा है। वे प्रबुद्ध पाठक भी ध्यान दें, जो व्हाट्सएप्प पढ़ कर दवा बनाने की कोशिश करते हैं। मैं इससे भी सहमत नहीं हूं कि किसी कम्पनी द्वारा निर्मित दवाओं को कूट पीस कर आपस में मिश्रित करके दवा तैयार की जाय क्योंकि वहां भी अपमिश्रण होकर गुणधर्म चेंज हो सकते हैं।जबकि 2 या 4 जड़ी बूटियों का मिश्रण ज्यादा शक्तिशाली होता है।फिर भी मैं अकेली औषधि ( जड़ी बूटी) से दवा तैयार करने के पक्ष में हूँ, क्योंकि वह पूर्णतया निरापद है और पूर्ण चंद्रमा की तरह शरीर में प्रकाश फैलाती है।
--------------------------------

पाइल्स के लिए

अगर आपको बवासीर ( पाइल्स ) की समस्या है तो जिमीकंद/सूरन/ओल का अचार रोज खाइये।लेकिन अचार में ज्यादा मसाले मिर्च न डलवाएं।तेल ज्यादा ही रखें।बवासीर और कब्ज जड़ से खत्म होगी।
---------------------------------

भादो में दही नहीं

भादो का महीना शुरू हो चुका है, इस माह में दही खाना वर्जित है।इस माह में दही खाने से पेट की पाचक क्षमता पर बहुत खराब असर पड़ता है ,जिसका दुष्परिणाम बदहजमी से लेकर पेट निकलने के रूप में सामने आता है।

Wednesday, May 31, 2017

नई खोज

जन्म का समय
यह एक ऐसी खोज है जो सिर्फ चिकित्सा विज्ञान ही नहीं जीवन के सभी कार्यों ,सभी क्षेत्रों में सामान्य से 70 गुना बेहतर परिणाम देगी।व्यक्ति की पैदाइश का जो समय होता है उस समय पर उसके शरीर की चैतन्यता अपनी पूरी high potency पर रहती है ।यदि कोई व्यक्ति बहुत दिनों से बेहोश है और किसी तरह बेहोशी नही टूट रही तो उस खास समय पर उसे दवा देकर या किसी और तरीके से होश में लाने की कोशिश की जाय तो 100% चांस है कि उसे होश आ जाय।
हर बच्चे की पैदाइश का समय उसके शरीर पर गुदवा देना चाहिए,ताकि भविष्य की किसी इमरजेंसी में काम आ जाये।अगर आपको किसी मुसीबत से निकलने का रास्ता नही मिल रहा है तो पैदाइश वाले वक्त अपने दिमाग को एकाग्र कीजिये,हर हाल में रास्ता मिल जाएगा।
---–-------/----------------

शिवलिंग की सही स्थापना होनी चाहिए--

हमारे धर्म में शंकर जी की कल्पना उनके मस्तक पर विराजमान गंगा नदी एवं चंद्रमा के साथ की गई है।इसके पीछे अनगिनत विद्वानों ने अनगिनत मत बताएं हैं किंतु इन मतों में एक बात सर्वमान्य है कि शिव निरंतर साधना में लीन रहते हैं तथा प्रचंड क्रोध शक्ति वाले देव हैं।संहारकर्ता के रूप में जाने जाते हैं अर्थात उनके अंदर ऊर्जा का अकथनीय अवर्णनीय भंडार है जो असीमित है।वे बर्फ की गुफाओं में हिमालय पर्वत पर निवास करते है, इसलिए कि उनकी ऊर्जा आक्रामक न होने पाए।
हम शिवमंदिर के निर्माण के वक्त यह बात भूल जाते हैं।विशाल शिवलिंग स्थापित कर देते है किंतु उनके शीश पर विराजमान गंगा जी की उपेक्षा कर देते हैं।निर्माण की प्रक्रिया में मंदिरों में यह व्यवस्था होनी चाहिए कि कोई जलधारा निरंतर शिवलिंग पर गिरती रहे और वह पानी अंदर पृथ्वी की गहराइयों में समाहित होता रहे।यही वास्तविक शिव मंदिर होगा।वर्ष में एक बार हजारों घड़े जल से अभिषेक करने से शिवलिंग से निरंतर निकलने वाली ऊर्जा को आप कंट्रोल नहीं कर सकते।पर्यावरण संतुलित करने के लिए यह आवश्यक है कि निरंतर जल उस पर गिरता रहे।शिवलिंग ऊर्जा का अथाह भंडार है।यह ऊर्जा लाखो करोड़ो शिवमंदिरों से निकल रही है और पृथ्वी के वातावरण को निरंतर गर्म कर रही है।शिवलिंग पर निरंतर गिरती जलधारा उस ऊर्जा को शांत करेगी और पृथ्वी में समाता हुआ जल पृथ्वी के सामान्य जलस्तर को बनाये रखेगा।जिससे हरियाली बढ़ेगी।मानसून आकर्षित भी होगा।पर्यावरण संतुलन वापस स्थापित होगा।
वक्त है कि हम अपनी गलती सुधार लें और धर्म की सही व्याख्या समझें।अन्यथा वैज्ञानिकों ने तो पृथ्वी की शेष आयु 100 से 500 वर्ष घोषित कर ही दी है।

Thursday, May 18, 2017

आयुर्वेदिक दवाओं की गुणवत्ता

     कुछ दिन पहले एक सम्मानित हिंदी दैनिक में एक समाचार प्रकाशित था कि " अब परचून की दुकान पर नही बेच पाएंगे आयुर्वेदिक दवाएं " इस शीर्षक के अंतर्गत समाचार था कि सरकार इस पर कानून लाने जा रही है जिसके तहत दवाओं के गुणवत्ता मानकों का निर्धारण किया जाएगा।
                                     मैं तभी से यह सोच रही हूँ कि अभी तक तो जड़ी बुटियों में पाए जाने वालेजीवन रक्षक तत्वों का तो निर्धारण ही नही हो पाया तो गुणवत्ता किस तत्व की निर्धारित करेगी सरकार।एक सामान्य चीज लीजिये - लौंग।लौंग में डैंड्रफ खत्म करने का भी तत्व है, लौंग में भीषण दर्द निवारक तत्व भी है ।लौंग में खांसी खत्म करने का भी तत्व है, बाल काले करने का भी, गैस नष्ट करने का भी, त्वचा को कांतिमय बनाने वाला भी और भोजन में स्वाद बढ़ाने वाला तत्व भी है।हमारे देश मे ऐसी अनुसन्धानशालायें तो अभी तक बनी ही नहीं जो इन तत्वों को अलग अलग पहचान सकें (क्योंकि सरकार के पास आयुर्वेदिक प्रयोगशालाओं के लिए फालतू धन नही है) तो गुणवत्ता निर्धारण आप किस चीज का करेंगे ? यही लौंग जो मसाले के रूप में इतनी महंगी मिलती है वह भी आप तक शुद्ध नही पहुंचती।इनका तेल पहले ही निकाल कर निर्यात कर चुके होते हैं व्यापारी।यही स्थिति ज्यादातर खुशबूदार मसालों और जड़ी बूटियों की है।
वैसे भी आयुर्वेदिक दवाएं यदि चूर्ण रूप में हैं तो 2 माह बाद उनकी क्षमता 60% तक कम हो जाती है।काढ़ा की लाइफ सिर्फ 24 घण्टे होती है।वलेह की लाइफ एक ऋतु भर अर्थात 3 महीना।केवल आरिष्ट और आसव ही हैं जो जितने पुराने होंगे उतने ही गुणकारी होते जाएंगे।शहद और घी भी इसी श्रेणी में आते हैं कि जितने पुराने उतने अच्छे। लेकिन उनके गुण भी हर ऋतु के बाद परिवर्तित होते जाते हैं फिर सरकार मानकों का निर्धारण किस आधार पर करेगी।जबकि बड़ी बड़ी नामी कंपनियां कई वर्ष पहले का भी पैक किया हुआ चूर्ण ,अवलेह ,च्यवनप्राश बेचती है उन पर आपत्ति नही की जाती। सरकार गुणवत्ता मानकों के निर्धारण की आड़ में छोटे पंसारियों और वैद्य हकीमो जैसे औषधि निर्माताओं पर कुठाराघात करने की तैयारी में लग रही है।
शायद परचून की दुकान पर बिकने वाली ताजी आयुर्वेदिक दवाएं ही भारतवर्ष की 70%जनता की तकलीफें दूर कर देती है ।साथ ही जड़ी बूटियों का टूटा फूटा ज्ञान भी जन सामान्य में बनाये रखती हैं। अन्यथा जड़ी बूटियों पर टी शोध कार्य हो ही नही रहा।न ही सामान्य भाषा मे लिपिबद्ध किया जा रहा है।
उ0 प्र0 हिंदी संस्थान द्वारा प्रकाशित पुस्तक "भारतीय औषधियां'' में स्पष्ट लिखा है कि सर्वाधिक जरूरत इस बात की है कि देसी जड़ी बूटियों की पहचान को सार्वजनिक पटल पर आम किया जाए।इस क्षेत्र में बहुत ज्यादा ज्ञान मध्य और उत्तरी भारत में मुसहर जाति, बंगाल में मौल, बेदिया, बागदी, कैवर्त, पोड, चंडाल, कवरा और करंगा जातियों तथा बम्बई में चन्द्रा, भील और गामत जातियों के पास है।मध्यप्रदेश की आदिवासी और नागा जातियों को भी नही भूलना चाहिए।आज भी इन जातियों के पास जड़ी बूटियों का जितना अधिक और सटीक ज्ञान है वह लिपिबद्ध ज्ञान से कई गुना ज्यादा है।इन जातियों को जब भी धन की जरूरत होती है तो ये जड़ी बूटियों को जंगलों से लाकर किसी पंसारी या परचून की दुकान पर इन जड़ियों का स्थानीय नाम और गुण बताकर बेच देते हैं जिसका लाभ रोगियों को मिल जाता है।ये जातियां डाबर वैद्यनाथ आदि नामी गिरामी कम्पनियों के पास जड़ियाँ बेचने नही जाते।सरकारी फरमान से तो इन जातियों को धन प्राप्ति और आम जनता को स्वास्थ्य लाभ का ये रास्ता भी बंद हो जाएगा।हमारे आयुरशास्त्र तो 1500 साल की गुलामी की भेंट चढ़ ही गये हैं।
जड़ी बूटियों में अपमिश्रण यानी मिलावट करने वालों को भारतवर्ष में अति प्राचीन काल से कठोर दंड देने का विधान था।विधान यह भी था कि अपने रोगियों के उपचार में गलती करने वाले चिकित्सकों को अर्थदण्ड भोगना होगा।दुर्भाग्य से आयुर्वेदिक चिकित्सा के ह्रास के साथ साथ इस दिशा में भी बड़ा परिवर्तन हुआ।कुछ तो अज्ञानतावश और कुछ जड़ी बूटी के व्यापारियों की मिलावट करने की प्रवृत्ति के कारण भेषजों में अपमिश्रण कई शताब्दियों से होता चला आ रहा है।मिलावट तो अलग है, कुछ व्यापारी ऐसे भी हैं जो निर्धारित मात्रा से कम औषधियों की पैकिंग बेचते हैं।मिलावटी जड़ी बूटियों का व्यापार बड़े व्यापक पैमाने पर बिना किसी भेदभाव के होता है अर्थात आम जनता को ही नहीं वैद्य, हकीम, औषधि निर्माताओं को भी शुद्ध जड़ी बूटियां नही मिल पातीं। चिरैता में कालमेघ के पत्ते मिला देना और जीरा के नाम पर गाजर का बीज दे देना आम बात है। जटामांसी और गुग्गल जैसी संवेदनशील और महंगी जड़ी बूटियां भी अर्क निकाली हुई मिल रही हैं।तो इनसे निर्मित औषधियां कितना कारगर होंगी ,खुद सोचिये।
अगर इस क्षेत्र में सरकार वाकई प्रभावी कदम उठाना चाहती है तो एक बाजार वह आयुष विभाग के अंतर्गत बनाये जहां प्राप्य और अप्राप्य सभी जड़ी बूटियां अपने मूल और विकसित स्वरूप में शुद्धता एवं पूर्ण गुणवत्ता के साथ मिल जाएं।जब कंपनियां वैद्य हकीम आदि चिकित्सक इस बाजार से जड़ी बूटियां लेकर दवा बनाएंगे तो वह ज्यादा कारगर होगी।आयुष विभाग के अधिकारी गण जड़ी बूटियों को उनके मूल स्थान से लेकर उचित तापमान एवं सफाई के साथ वैज्ञानिकों के निर्देशानुसार संग्रह कराएंगे तो एक ही छत के नीचे अद्भुत एवं कीमती खजाना एकत्र होगा।स्थानीय उपरोक्त वर्णित जातियों से भी इनका ज्ञान प्राप्त कर संग्रह होगा।यह सब आयुष विभाग करेगा तो लिपिबद्धता में भी आसानी होगी तथा दुर्लभ एवं लुप्त प्रायः औषधियों को संरक्षित एवं विकसित करने की दिशा में भी उत्कृष्ट कार्य हो सकेगा।अस्तु।

Tuesday, February 14, 2017

आयुर्वेद क्या है

            आयुर्वेद का अर्थ है आयु की रक्षा करने का ज्ञान, प्राकृतिक आपदाओं जैसे आंधी तूफ़ान ,भूचाल,अकाल, लू, बर्फ, पानी आदि में भी शरीर को चैतन्य बनाये रखने का ज्ञान।वर्ष में 6 ऋतुएँ होती है, प्रत्येक ऋतु में उचित खान पान और जड़ी बुटियों की सहायता से शरीर की जीवनी शक्ति को यथावत रखने का ज्ञान ही आयुर्वेद है।
बड़े भाग मानुष तन पावा।
यह पंक्ति मानुष तन की वास्तविक शक्ति को परिभाषित करती है।इसी तन की सहायता से तन में निवास करने वाली आत्मा तपस्या की पराकाष्ठा को पा सकती है।अन्य किसी जीव जंतु वनस्पति ,कीट, पक्षी आदि के शरीर में रह कर तपस्या संभव नहीं क्योंकि मस्तिष्क सिर्फ मनुष्य को ही मिला है।तपस्या ही वह ज्ञान है जिसकी तलाश सदियों से मनुष्य करता आया है।इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए शरीर में ताकत तो जरुरी है क्योंकि 
भूखे भजन न होय गोपाला
शरीर कही तकलीफ में होगा तो आप भजन तो नहीं कर पाएंगे।कही दर्द हो रहा होगा तो फ़िल्म देखना ,घूमना टहलना भी अच्छा नहीं लगेगा।तप तो दूर की बात है।
आज हम जानते है  कि सदियों पहले युद्ध होते थे, घोड़े हाथी, तलवार, फरसे, धनुष, कटार प्रयोग होते थे। दिन ढलते ही युद्ध रुक जाते थे।फिर घायल सैनिकों और जानवरों को रात ही रात में उपचार करके अगले दिन के युद्ध के लिए स्वस्थ कर दिया जाता था।सोचिये कैसी जड़ी बुटियों की ताकत थी कि गहरे घाव सुबह तक भर जाते थे,टूटी हड्डियाँ ठीक हो जाती थीं।उन्ही जड़ी बुटियों की धरा पर आज हम पूरा जीवन टैबलेट और कैप्सूलों के सहारे काट रहे हैं।दर्द में जी रहे हैं।100 लोगों से पूछ लीजिये, एक भी ऐसा नहीं मिलेगा जिसको एक माह के अंदर कोई दवा न खानी पड़ी हो।
हम आयुर्वेद को भुला बैठे हैं, जीवन का उद्देश्य भुला बैठे हैं ।इसीलिए दुखी हैं।रोज रामचरित मानस के पाठ होते हैं, हजारों लोग प्रवचन की दूकान खोले बैठे हैं लेकिन किसी की निगाह इस पंक्ति पर नहीं जाती कि आखिर मानुष तन को दुर्लभ श्रेणी क्यों दी गयी है, पुराणों में ?
हजार वर्ष पूर्व तक भी आयुर्वेद जिंदगी में शामिल था।राजा महाराजा आकर्षक व्यक्तित्व और बलिष्ठ शरीर के स्वामी होते थे और लंबी आयु जीते थे।आम मनुष्य भी स्वस्थ और बलिष्ठ होते थे।निरोगी होते थे।वे समयानुसार ऋतुओ के अनुसार जड़ी बुटियों का सेवन करते थे।रोगी और निर्बल कोई होता ही नहीं था। आज हम रोगी होने का इन्तजार करते हैं फिर एलोपैथ ,होमियोपैथ, नेचुरोपैथ ,झाड़ फूक, आदि सब ट्राई करके भी स्वस्थ नहीं होते हैं तो मरता क्या न करता वाली मानसिकता में आकर आयुर्वेद के विषय में सोचते हैं कि लाओ इसको भी ट्राई कर लें।

Saturday, January 14, 2017

टिप्स जो व्हाट्सऐप पर मैंने भेजी

पूरे देश में वायरल फैला है ,पहले जुकाम होता है फिर बुखार हो जाता है जो दवाओं से कुछ ही देर के लिए उतरता है फिर वैसे ही हो जाता है ।
इसका सबसे बढ़िया उपाय है कि आप दालचीनी का काढ़ा सुबह दोपहर शाम पीजिये। कम से कम 4 ग्राम दालचीनी चूर्ण को 150 ग्राम पानी में 10 मिनट तक उबालिये।फिर बिना छाने पी लीजिये।एक बार में। फिर दोपहर को भी और शाम को भी।
किडनी भिन्न भिन्न कारणों से डैमेज होती है और कई जानलेवा बीमारियां पैदा हो जाती हैं। इस मौसम में मूली और शलजम प्रचुर मात्रा में बाजार में है।आप सुबह नाश्ते से पहले 50 ग्राम मूली का रस और 50 ग्राम शलजम का रस मिला कर पी लें तो किडनी का डैमेज रिपेयर हो सकता है।मूली पत्ते सहित पीस कर रस निकालें।कम से कम 21 दिनों तक जरूर पीयें।
भूख बढ़ाने के लिए
दालचीनी, इलायची, जीरा, जवाखार, सोंठ 50-50 ग्राम  लीजिये मिला कर पीस लीजिये।रोज 3 ग्राम चूर्ण सुबह पानी से निगल लीजिये।
पाचनशक्ति भी बढ़ेगी
भूख भी।
आमाशय शुद्ध और पावरफुल हो जाएगा।
अर्जुन विलम्ब पातक होगा ।
शैथिल्य प्राणघातक होगा ।।
             यह पक्तियां रोग के सन्दर्भ में बिलकुल सटीक हैं , क्योंकि रोग भले ही कैंसर, एड्स, वायरल जैसे जानलेवा हों, अगर शुरू होते ही इनका इलाज हो तो ख़त्म हो जाते हैं।किन्तु हम भारतीयों को रोग पालने की आदत है, इसी कारण बहुत छोटी छोटी बीमारियां जीवन भर के लिए अभिशाप बन जाती हैं।
            खैर दीपावली के इस मौसम में शरीर की भलाई के लिए जिमीकन्द/ओल/सूरन का प्रयोग सब्जी, भर्ता या अचार के रूप में जरूर करें।
यह बवासीर, कोलायटिस, भगंदर की बहुत अच्छी दवा है।लगातार एक माह प्रयोग कीजिए।
बाल की समस्या हो तो आधा किलो सरसो का तेल लीजिये उसमे 150 ग्राम सूखे आवले के टुकड़े डाल दीजिये, 3 या4 सूखे गुलाब के फूल डाल दीजिये। 7 दिन तक बोतल बंद करके धुप में रख दीजिये।रोज एक बार तेजी से बोतल हिला दीजिये जिससे सारी सामग्रियां ऊपर नीचे हो जाएँ।आठवें दिन से आप यह तेल सिर में लगा सकते हैं।आंवला आदि नीचे बैठ जाएगा ऊपर से तेल लगाते रहिये।आंवला बाद में खाने के काम आ जाएगा।
आँखों की किसी भी बिमारी के लिए ---
एक सेब आग पर भूनिये, बैंगन की तरह।
फिर उसको निचोड़ के रस पी जाइए और गूदे को दोनों आँखों पर लेप करके आधा घण्टा छोड़ दीजिये।
5 दिन लगातार यह काम कीजिए।आँखों की 90 %बीमारियां खत्म हो जाएंगी।

Thursday, December 29, 2016

पेट के रोग और सरसो का तेल

इसको ध्यान से देखिये
एक छोटा सा वीडियो शूट हुआ है देखियेगा जरूर।
https://youtu.be/yeMW6qbXv7E

Monday, November 28, 2016

भिलावा और भिलावा रसायन

भिलावा कोसंस्कृत में भल्लातक कहते हैं और वैज्ञानिक भाषा में Semicarpus anacardium ।इसका पेड़ 30 फुट तक ऊँचा देखा गया है  ।इस पेड़ में हरे और पीले दो तरह के फूल खिलते हैं जिसमे से एक नर फूल होता है और दूसरा मादा।
भिलावा के फल में दो तरह का तेल पाया जाता है।इसकी गिरी के अंदर मीठा तेल और फल के रस में काले रंग का विषैला तेल।यह तेल शरीर में कहीं भी लग जाए तो छाले पड़ जाते है।
भिलावा एक ऐसा फल है जिसमें कैंसर को जड़ से खतम कर देने की ताकत है ।
यह फल कफनाशक, पित्त नाशक और वातनाशक भी है। यह हृदय रोग, आमाशय रोग, दन्त रोग और पुराने बुखार को भी ठीक करता है।यह सांप के जहर को मारता है। यह चर्म रोग को भी सही करता है।कोई घाव सड़ गया हो तो इसी भिलावे के तेल से वह सही हो जाता है और अंग काटने की नौबत नहीं आती।तिल्ली या लीवर बढ़ गया हो तो भिलावा रामबाण औषध है।यदि कफ के साथ रक्त आ रहा है तो फौरन भिलावे की शरण में जाएँ।
इसके इतने सारे फायदे हैं किंतु जैसे मैंने अन्य लेखों म यह बताया है कि इसकी दवाएं किस तरह से बनाएं ,उस तरह भिलावे की किसी दवा की निर्माण विधि मैं नहीं लिख सकती क्योंकि यह बहुत खतरनाक चीज है ।इसका तेल ज़रा सा भी शरीर मे कहीं पर लग जाए तो छाले और जलन महीनो तक परेशान करती है।
भिलावा रसायन के फायदे जो अगस्त्य मुनि ने बताये हैं और भैषज्य रत्नावली में उद्धृत हैं-------
इस रसायन के प्रताप से रोगी हाथी के समान बलवान, घोड़े के समान वेगवान और बृहस्पति से भी अधिक बुद्धिमान हो जाता है।बड़े बड़े ग्रन्थ को समझ लेता है और याद कर लेता है।500 वर्ष तक जीता है।इससे सभी कुष्ठ रोग अवश्य दूर हो जाते हैं।मनुष्य सुवर्ण के समान कांतिमान हो जाता है।टूटे दांत निकल आते हैं और सफ़ेद बाल भी काले हो जाते हैं, मोर के समान उत्तम स्वर हो जाता है।प्रसन्न इन्द्रियों वाला और विशेष प्रतिभाशाली हो जाता है।नवयौवन चिरस्थायी हो जाता है।
मेरा अनुभव यह कहता है कि प्रत्यइठंड के मौसम मे 3 माह यदि भिलावा रसायन खा लिया जाए तो आप अपने शरीर के साथ वास्तविक न्याय करेंगे।शरीर हमेशा खिला खिला सा रहेगा।अनेक छोटी छोटी समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी।इम्युनिटी तो बढ़ेगी ही।
मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाको में इसका बहुत सेवन होता है। आदिवासी लोग इसको भून कर इसके अंदर की गिरी खाते है।पर इसकी एक गिरी एक दिन मे पचना भी मुशकील होता है। इसे खाने का आसान तरीका भिलावा रसायन ही है जो सुरक्षित है और स्वादिष्ट भी।
म्र को बहुत तेजी से थामता है भिलावा रसायन।

Tuesday, October 25, 2016

कोलायटिस, पाइल्स

अर्जुन विलम्ब पातक होगा ।
शैथिल्य प्राणघातक होगा ।।
             यह पक्तियां रोग के सन्दर्भ में बिलकुल सटीक हैं , क्योंकि रोग भले ही कैंसर, एड्स, वायरल जैसे जानलेवा हों, अगर शुरू होते ही इनका इलाज हो तो ख़त्म हो जाते हैं।किन्तु हम भारतीयों को रोग पालने की आदत है, इसी कारण बहुत छोटी छोटी बीमारियां जीवन भर के लिए अभिशाप बन जाती हैं। जैसे साधारण सी सर्दी खांसी बाद में दमबन जाती है
            खैर दीपावली के इस मौसम में शरीर की भलाई के लिए जिमीकन्द/ओल/सूरन का प्रयोग सब्जी, भर्ता या अचार के रूप में जरूर करें।
यह बवासीर, कोलायटिस, भगंदर की बहुत अच्छी दवा है।लगातार एक माह प्रयोग कीजिए।

Tuesday, October 18, 2016

बालों एवं मस्तिष्क की सुरक्षा के लिए

बाल की समस्या हो तो आधा किलो सरसो का तेल लीजिये उसमे 150 ग्राम सूखे आवले के टुकड़े डाल दीजिये, 3 या4 सूखे गुलाब के फूल डाल दीजिये। 7 दिन तक बोतल बंद करके धुप में रख दीजिये।रोज एक बार तेजी से बोतल हिला दीजिये जिससे सारी सामग्रियां ऊपर नीचे हो जाएँ।आठवें दिन से आप यह तेल सिर में लगा सकते हैं।आंवला आदि नीचे बैठ जाएगा ऊपर से तेल लगाते रहिये।आंवला बाद में खाने के काम आ जाएगा।

Wednesday, September 21, 2016

डेंगू, चिकनगुनिया

डेंगू और चिकनगुनिया से बचने के लिए चार चीजे जरूर घर में रखिये
कलौंजी गुड़ अजवाइन दालचीनी
साथ में आलू भी।
किसी को भी बुखार पैरासिटामॉल खाने से केवल 4 घंटे के लिए उतर रहा हो तो फ़ौरन मुझे फोन कीजिये। 9889478084, 8604992545
या निम्नलिखित तरीका अप्लाई कीजिये।
250 ग्राम कलौंजी को पीस लीजिये उसमें 250 या 300 ग्राम गुड़ मिला दीजिये।अगर लसलसा पन आ गया है तो सामान्य आकार का लड्डू बना लीजिये।मरीज को एक एक लड्डू सुबह दोपहर शाम खाना है कम से कम 4 दिन लगातार। 4 दिन बाद दिन में बस एक लड्डू खाना है।
यही एक लड्डू दिन में एक बार मरीज के बाक़ी घर के लोग खा लें तो उनको बुखार नहीं होगा।
एक चम्मच अजवाइन और एक चम्मच दालचीनी को 300 ग्राम पानी में 15 मिनट उबालना है इसमें भी गुड़ डालना है।अगर मिल जाएँ तो तुलसी के 20 या 25 पत्ते और 10 दाने काली मिर्च भी। यह काढ़ा छान कर आधा आधा दिन में 2 बार पीना है चाय की तरह।
मरीज के घर के लोग दिन में बस 1 बार पिएंगे।
बुखार उतरने के बाद मरीज को आलू कम से कम 250 ग्राम उबाल कर काट कर उसमें नमक निम्बू भुना जीरा काली मिर्च चाट मसाला आदि मिला कर खिलाएं।इस चाट में कोई तेल या लाल मिर्च नहीं डालनी।
अगर मिल जाए तो गिलोय का काढ़ा भी सुबह शाम पीयें।
ये सारे काम सिर्फ एक हफ्ते ही करने हैं।लीवर भी सही होगा।ताकत भी आएगी और बुखार का वायरस जड़ से ख़त्म हो जाएगा।चिकनगुनिया के बाद शरीर की हड्डियों में दर्द भी नहीं होगा न ही हड्डियाँ टेढ़ी होंगी।

Sunday, August 28, 2016

पानी पीने का तरीका


जब मैं किसी से कहती हूँ कि पानी ज्यादा पिया करो तो मुझे सुनने को मिलता है कि हम तो सारे दिन पानी पीते हैं और खूब पानी पीते हैं।
मगर सत्यता बिलकुल विपरीत होती है।
आप एक एक घूंट पानी सारे दिन पीते रहें तो बेकार है ऐसे पानी पीना।एक बार में कम से कम 200 ग्राम पानी पीजिये तो किडनी पर प्रेशर पड़ेगा और वो काम करेगी, तब मूत्राशय पर प्रेशर आएगा और बढ़िया यूरीन डिस्चार्ज होगा।फ़ोर्स से होगा और पथरी नहीं बनने पाएगी।अगर होगी तो यूरीन के फ़ोर्स के साथ बाहर निकल जायेगी।
एक एक घूंट पानी पीने से न किडनी की सफाई हो पाती है न मूत्राशय की।
नतीजा आपकी किडनी डैमेज होने लगती है।यह रोग बहुत फैला है इस समय।
सावधान हो जाएँ।

Saturday, August 27, 2016

पीने का औषधीय पानी


हर घर में पेट की बिमारी है, एक सरल काम आप कर सकते हैं, जिससे लीवर, किडनी दोनों ही सही रहेंगे ---
एक घड़े में या किसी भी उस बर्तन में जिसमें आप पीने का पानी रखते हैं, उसमें एक चम्मच अजवाइन एक कपडे की पोटली में बाँध कर डाल दीजिये।1 बार की पोटली 3 दिन रहने दीजिये रोज उसी बर्तन में और पानी भर लीजिये, 3 दिन बाद पोटली बदलनी है।फिर नयी पोटली में  एक चम्मच जीरा रख कर पीने के पानी में डाल दीजिये।3 दिन बाद नई पोटली में मेथी  फिर ३ दिन बाद सौंफ।एक चम्मच में १० ग्राम सामान आना  चाहिए।
इस क्रिया से पानी शुद्ध भी होगा और दवा के गुण भी आ जाएंगे। यह पानी पेट की सारी परेशानियो से आपको मुक्त कर देगा।

Saturday, June 18, 2016

रेप केसेस और अपराध के पीछे का सच


मैं बहुत दिनों  अपने पाठकों से इस विषय पर बात करने के लिए सोच रही थी कि आज एक बहाना भी मिल गया। आज हिन्दुस्तान के  सम्पादकीय पेज पर राजेन्द्र धोड़पकर जी का लेख निकला है कि -"यह क्रूरता कहाँ से आती है " . इस विषय पर जब भी समाज के लोगों के बीच बहस होती है और जो निदान निकाला जाता है उनको सुनकर ऐसा ही  लगता है जैसे किसी पेड़ की हरियाली लौटाने के लिए उसकी ऊपरी पत्तियों और टहनियों पर पानी डाला जा रहा है ,जड़ों की तरफ कोई देख ही नहीं रहा। आइये देखते हैं कि इसकी जड़ें कहाँ हैं ---

वैसे आपको यह जान कर  आश्चर्य  होगा  कि इसके लिए हम ही  जिम्मेदार हैं।
पहला  कारण  -- जब भी कोई  नारी गर्भवती होती  है तो आयुर्वेद में उससे शारीरिक सम्बन्ध  बनाने की स्पष्ट मनाही की जाती है।
उसको अत्यधिक  आदर और सुख देने की बात कही जाती है। मगर ऐसा  होता नहीं। इसका बिलकुल विपरीत होता है।पुराणों में अनेक कथाओं में आपने पढ़ा होगा कि गर्भवती नारी को देवता खुद  प्रणाम करते हैं।और समाज में ??  गर्भवती नारी का मन शिशु से पूरी तरह जुड़ चुका होता है ,उसके द्वारा महसूस किया गया  सुख  दुःख और प्रत्येक स्वाद, एहसास और ज्ञान गर्भस्थ शिशु को मिलता है। अभिमन्यु की कथा तो आपको याद ही होगी। आप  जब अपनी गर्भवती पत्नी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं तो वस्तुतः यह नैतिकता  के विरुद्ध होता है क्योंकि आप पत्नी के साथ  नहीं वरन गर्भस्थ शिशु के साथ सम्बन्ध बना रहे  होते हैं. पत्नी का मन और तन दोनों ही  न ऐसे सम्बन्ध की चाह रखता है ,न ही अनुकूल होता है। इस सम्बन्ध का  बैड इफेक्ट शिशु के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है। संयम और नैतिकता  कंट्रोल करने वाला हारमोन यहीं डिसबैलेंस हो  जाता  है। शिशु को पहली शिक्षा  ही शारीरिक आकर्षण और सम्बन्ध की मिलती है। 

दूसरा कारण --- जब भी नारी गर्भवती होती है तो उसको छोटी -बड़ी अनेक दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। फिर हर दिक्कत के लिए हम इंजेक्शन ,टैबलेट आदि अंग्रेजी  दवाओं का सहारा लेते हैं। जिनके  साइड इफेक्ट जरूर होते हैं। जबकि ये सारी दिक्कतें रसोई में मौजूद चीजों से ही दूर हो सकती हैं जिनका कोई साइड  इफेक्ट नहीं होता। ये अंग्रेजी दवाएं गर्भस्थ शिशु  शारीरिक ,मानसिक विकास को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए  जिन महिलाओं ने गर्भवस्था में  पेट दर्द और सर दर्द के लिए दवाएं ज्यादा  ली होती हैं  उनके बच्चों के बाल कम उम्र में ही सफ़ेद होने लगते हैं और आई साइट कमजोर हो जाती  है। किसी किसी बालक को दोनों ही समस्याएं आती हैं। इम्युनिटी तो सभी बच्चों की  जरूर कम हो  जाती है ,नतीजा ये होता है कि पैदाइश के दो दिन बाद से ही डॉक्टर्स और हॉस्पिटल के चक्कर लगने शुरू हो जाते हैं। फिर इंजेक्शन, सीरप और टैबलेट का सिलसिला शुरू हो जाता है। नवजात शिशु को 6 माह तक माता के दूध के सिवा सारी चीजें देने की मनाही होती है और  उस नाजुक कोमल शरीर में भारी भारी केमिकल एंटी बायोटिक रूप में पहुँचने लगते हैं। जो शिशु में  हार्मोनल डिसबैलेंस पैदा करते हैं और बच्चे समय  से पहले ही जवान होने लगते हैं। हम लोग सारा दोष इंटरनेट ,मूवीज,और टी वी के सिर मढ़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। जबकि छोटे बच्चों के ज्यादातर  रोग तो मालिश ,सिकाई ,काढ़े  ही दूर हो जाते हैं। अनावश्यक रूप  से शरीर में पहुंची  ये दवाएं बच्चों की एकाग्रता छीन लेती हैं ,धैर्य धारण करने की क्षमता खत्म कर देती हैं। उत्तेजना और क्रोध बढ़ा भी देती हैं। सोचिये हम किस तरह के नागरिक  तैयार कर रहे  हैं। 

तीसरा कारण -- गर्भस्थ शिशु माता की संवेदनाओं को ग्रहण करता है ,इसीलिये गर्भवती को खुश रखने को कहा गया है ,उसके अच्छे  खाने पीने ,घूमने,अच्छे  साहित्य पढ़ने और सत्संग पर जोर दिया जाता है ,जिससे शिशु शांत,प्रसन्नचित्त और नैतिकता से भरपूर हो। हमारे समाज में होता है जस्ट उलटा।  सास, नन्द  झगड़े ,तकरार गर्भवती को या तो विद्रोह से भर देते हैं या अंजाना डर पैदा करते हैं। फलतः शिशु आक्रामक या दब्बू या कॉन्फिडेंस -लेस पैदा होता है।  रही सही कसर टीवी सीरियल के परिवार  तोड़ूं  दांव -पेंच पूरी  कर देते हैं।(याद कीजिये मूवी -"तीस मार खाँ ") जब नींव ही दुर्गुणों और दुष्प्रभावों से रक्त - रंजित हो तो उस पर शान्ति और सद्भावना की फसल उगेगी कैसे ?

ये दुष्प्रभाव उच्च कोटि की शिक्षा,पारिवारिक संस्कार और समाज के दबाव में दब सकते हैं ,और अनुकूल वातावरण शैतानियत को हावी होने से रोक सकता है। लेकिन ये बहुत मुश्किल है। आज कल की शिक्षा ज्ञान नहीं देती। मिड डे  मील और नंबरों की होड़ तक सीमित रह गयी है ,डिग्री खरीद ली जाती है ,ज्ञान मिलता नहीं। परिवार एकल रह गए हैं और बचा समाज ;इंटरनेट ,वीडिओ गेम ,मोबाइल में १२ से 15  घंटे बिताने वाले किशोर वहां तो उच्च कोटि की मार धाड़ , नशे आदि आनंद का ककहरा सीखते हैं। इंसानियत की शिक्षा के स्रोत ही दुर्लभ हो गए हैं। तो नैतिकता पनपेगी कैसे। लेकिन फिर भी कहा जा सकता  है कि बीज अच्छा होगा तो प्रतिकूल  वातावरण में भी मीठी फसल देगा। इसलिए बीजों की क्वालिटी निर्धारित करना ही हमारे हाथ में है। 

Thursday, April 28, 2016

आपके गंजे सर पर कैथ बाल उगा सकता है.


                                  


इसे पहचाना आपने ?यह कैथ का फल है। जो अक्सर स्कूलों के बाहर बिकता हुआ दिखाई देता है। लड़कियां बड़े चाव से खाती हैं। कुछ खट्टा मीठा सा होता है।  अक्सर इसे लोग हिकारत से देखते हैं। लेकिन ये है बड़े काम की चीज। आज के बाद कहीं बिकता दिखाई दे तो जरूर घर ले आइएगा। 
इसका पेड़ सारे देश में पाया जाता है। छोटे और चिकने पत्तों वाला ये पेड़ कम से कम 15 फुट ऊँचा तो होता ही    है। आप इसके फल के बीज कभी  फेकिएगा। हार्ट  पेशेंट के लिए तो अमृत हैं  इसके बीज। इसके २ बीजों का चूर्ण  बनाकर  कम से कम २१ दिन तक निगल लीजिए ,सादे पानी से। हार्ट प्रॉब्लम ख़त्म। उसके बाद साल भर तक हफ्ते में एक ही बार बीजों का चूर्ण लीजिएगा। 
कच्चे कैथ के गूदे के चूर्ण को खाने से आमातिसार अर्थात  दस्त और आंव  बहुत फायदा मिलता है। 5  ग्राम चूर्ण सादे पानी  से 5  दिनों तक निगलिए। 
कच्चे कैथ के रस में कसीस और करंज  को पीस कर ३ माह तक लगाने से सिर पर बाल  उग जाते हैं। 
इसका तेल दाद, खाज, खुजली पर लगाने से आराम मिलता है। 
बच्चों के पेट में दर्द  हो रहा हो तो बेलगिरी और कैथ  गूदे का शरबत मिला कर १-१ कप पिलाइए। एक बार पीने में ही आराम आ जाएगा।  
कच्चे कैथ  रस निकाल कर उसमे बराबर मात्रा में शहद मिलाइये और शहद की आधी मात्रा में छोटी पीपल का चूर्ण मिला लीजिये। यह दवा तैयार हो गई। किसी को उलटी आ रही हो तो आधा चम्मच यह दवा चटा दीजिये ,आराम मिल जाएगा। गर्भवती हों तो यह दवा जरूर बना कर रखिये। यह दवा बार बार आने वाली हिचकी में  भी काम करती है। 
दमा या अस्थमा की शिकायत हो तो कच्चे कैथ का रस १५ ग्राम रोज पीजिए। ४१ दिन में बीमारी जड़ से खत्म हो जायेगी। 
कैथ के पत्ते भी बहुत काम के हैं। दांत,मसूढ़े,या गले में कोई गांठ या दर्द हो तो पत्तों के काढ़े से गरारा और कुल्ला दोनों कीजिये। तुरंत आराम मिलेगा। सफ़ेद पानी गिरने की शिकायत में इसके पत्तों के साथ बांस के पत्ते पीस कर शहद से २ महीने तक चाटिये। 
कैथ अकेला  ऐसा खट्टा फल है जो वीर्यवर्धक है। वर्ना सभी खट्टे फल वीर्य का नाश करते हैं। 


कैथ को हिंदी में बिलिन या कटबेल भी कहते हैं। मराठी,गुजराती और फ़ारसी  में इसे कबीट कहते हैं। इसे तेलगू  में ऐलागाकाय और संस्कृत  में कपित्थ ,कुचफल ,गन्धफल ,चिरपाकी ,बैशाख नक्षत्री,दधिफल कहते हैं। वैज्ञानिक भाषा में इसे Feronia elephantum के नाम से जाना जाता है। 



इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा