बहुत धुँधुआ चुकी, अब आग फूटे ,किरण सारी सिमट कर आज छूटे।
छिपे हों देवता! अंगार जो भी ,दबे हों प्राण में हुंकार जो भी,
उन्हें पूंजित करो , आकार दो हे !मुझे मेरा ज्वलित श्रृंगार दो हे !
पवन का वेग दो, दुर्जय अनल दो,विकर्तन आज अपना तेज-बल दो !
चरण का भार लो,सिर पर संभालो, नियति की दूतियों मस्तक झुका लो।
चलो, जिस भाँति चलने को कहूँ मैं ,
ढलो, जिस भाँति ढलने को कहूँ मैं।
छिपे हों देवता! अंगार जो भी ,दबे हों प्राण में हुंकार जो भी,
उन्हें पूंजित करो , आकार दो हे !मुझे मेरा ज्वलित श्रृंगार दो हे !
पवन का वेग दो, दुर्जय अनल दो,विकर्तन आज अपना तेज-बल दो !
चरण का भार लो,सिर पर संभालो, नियति की दूतियों मस्तक झुका लो।
चलो, जिस भाँति चलने को कहूँ मैं ,
ढलो, जिस भाँति ढलने को कहूँ मैं।
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