अगर मैं साहित्य अकादमी की अध्यक्ष होती तो सबसे पहले पुरस्कार वितरण ही ख़त्म कर देती। मुझे कोई ये बताये कि जिन लोगों को पुरस्कार दिए जाते हैं ,उनलोगो की कोई भी एक रचना देश के ५ बच्चों को याद रहती पाई गयी है ?
खुदी राम बोस ,रामप्रसाद बिस्मिल ने लिखी थी एक कविता।सरफ़रोशी की तमन्ना ........ सारे देश को याद है ,उनको कोई पुरस्कार मिला ? रामचरितमानस हर घर की शोभा है। तुलसीदास को कोई सम्मान मिला ? तो मुझे यह बताइये कि साहित्यकार को पुरस्कार सम्मान की क्या जरुरत है ?
राजा को मुकुट की जरुरत नहीं होती। ज्ञानी को डिग्री की जरुरत नहीं होती। पंडितजी को सम्मान की जरुरत नहीं होती उसी तरह कवियों लेखकों को पुरस्कार की जरुरत नहीं होनी चाहिए। जैसे पंडित इस देश में हमेशा सम्मान पाते हैं उसी तरह कवि भी इस देश में सदा से प्रशंसनीय रहे हैं और जनता उनकी आग्रही रही है। पंडित चुपचाप सुख दुःख में अपना कर्तव्य निभाते हैं उसी तरह कवियों कविता के सृजन में अपना कर्तव्य निभाते रहना होगा। इस देश में आजादी का बिगुल कवियों लेखकों ने ही फूंका था ,उस समय इन्हें पुरस्कार की चाह नहीं थी मगर आग देश में फ़ैल गयी थी। जनता इसीलिए इन्हे सर-माथे पर बिठाती रही है।
ये पुरस्कार पाने वाले तो शायद अपने गली मोहल्ले में भी पहचान के लिए तरसते हों और पुरस्कार पाने -लौटाने का दामन थाम कर पूरे देश के सर माथे बैठना चाह्हते हैं ? ४ दिन बाद भूल जाते हैं सब। ख़त्म करिये ये पुरस्कार सम्मान का लेना-देना।
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